

नई दिल्ली। भारत में अगले वर्ष से 10 और 20 रुपये के प्लास्टिक (पॉलीमर) नोटों का चलन शुरू हो सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस दिशा में तेजी से तैयारी कर रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (बीआरबीएनएमपीएल) की बेंगलुरु इकाई ने पॉलीमर नोटों के निर्माण के लिए आवश्यक विशेष पॉलीमर सब्सट्रेट शीटों की आपूर्ति एवं निर्माण हेतु वैश्विक कंपनियों से निविदाएं आमंत्रित की हैं। इन निविदाओं को 18 अगस्त को खोला जाएगा।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 10 और 20 रुपये के पॉलीमर नोटों का प्रस्ताव विचाराधीन है। इसे पहले पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू करने की योजना है और इस संबंध में अध्ययन जारी है। हाल ही में पटना और मुंबई में आयोजित आरबीआई बोर्ड की बैठकों में भी इस विषय पर चर्चा की गई।
छोटे नोट सबसे जल्दी होते हैं खराब
आरबीआई के अनुसार, 10 और 20 रुपये के नोट सबसे अधिक प्रचलन में रहते हैं, इसलिए ये जल्दी फट जाते हैं और खराब हो जाते हैं। हर वर्ष बड़ी संख्या में इन नोटों को बदलना पड़ता है, जिससे हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होता है।
पॉलीमर नोट सामान्य कागजी नोटों की तुलना में दो से तीन गुना अधिक समय तक उपयोग में रह सकते हैं। ये पानी, नमी और गंदगी से कम प्रभावित होते हैं तथा अधिक टिकाऊ होते हैं।
नकली नोटों पर लगेगी रोक
नए पॉलीमर नोटों में अत्याधुनिक सुरक्षा फीचर शामिल किए जाएंगे। इनमें पारदर्शी विंडो, उन्नत सुरक्षा धागा और आधुनिक होलोग्राफिक सुरक्षा तकनीक जैसी विशेषताएं होंगी, जिससे नकली नोटों की पहचान आसान होगी और जालसाजी पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।
ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन सहित दुनिया के लगभग 60 देशों में पहले से ही विभिन्न मूल्यवर्ग के पॉलीमर नोट सफलतापूर्वक उपयोग किए जा रहे हैं।
16 वर्षों में तीसरी कोशिश
भारत में पॉलीमर नोट शुरू करने का यह पिछले 16 वर्षों में तीसरा प्रयास है। पहली बार अप्रैल 2010 में आरबीआई ने इस परियोजना के लिए प्री-क्वालिफिकेशन नोटिस जारी किया था, जिसमें आठ कंपनियों ने रुचि दिखाई थी। वर्ष 2013-14 में सरकार ने जयपुर, शिमला, भुवनेश्वर, मैसूर और कोच्चि में 10 रुपये के लगभग एक अरब पॉलीमर नोटों का फील्ड ट्रायल प्रस्तावित किया था।
इसके बाद मार्च 2017 में केंद्र सरकार ने दोबारा फील्ड ट्रायल को मंजूरी दी और पॉलीमर शीट खरीदने तथा नोट छापने की अनुमति भी दी थी। हालांकि तकनीकी और परिचालन संबंधी चुनौतियों के कारण दोनों प्रयास सफल नहीं हो सके।
पहले क्यों नहीं हो पाया सफल
पूर्व में देश के एटीएम, कैश डिपॉजिट मशीनें और नोट गिनने वाली मशीनें पारंपरिक कागजी नोटों के अनुरूप बनी थीं। पॉलीमर नोटों की अलग बनावट के कारण इन मशीनों को अपग्रेड करने में भारी लागत आती थी। इसके अलावा पॉलीमर शीट पूरी तरह आयात करनी पड़ती थी, जिससे परियोजना महंगी साबित हो रही थी।
इस बार क्या बदला
इस बार आरबीआई की रणनीति पहले से अलग है। केवल पॉलीमर शीट आयात करने के बजाय देश में ही इनके निर्माण की व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। इससे उत्पादन लागत कम होने की उम्मीद है। साथ ही एटीएम और अन्य बैंकिंग मशीनों को भी पॉलीमर नोटों के अनुरूप अपग्रेड करने की तैयारी की जा रही है, ताकि वितरण और लेनदेन में किसी प्रकार की तकनीकी समस्या न आए।
नोटों की छपाई पर भारी खर्च
वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान देश में कागजी मुद्रा की छपाई पर 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसी अवधि में 23.8 अरब खराब और अनुपयोगी नोटों को नष्ट करना पड़ा। आरबीआई का मानना है कि पॉलीमर नोटों के इस्तेमाल से यह खर्च काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
सिक्कों का विकल्प नहीं चला
पॉलीमर नोटों की योजना में देरी होने पर आरबीआई ने छोटे मूल्यवर्ग में सिक्कों के उपयोग को बढ़ावा देने का प्रयास किया था, लेकिन आम लोगों के बीच सिक्कों की स्वीकार्यता अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ सकी। ऐसे में अब फिर से पॉलीमर नोटों को व्यवहारिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
यदि मौजूदा प्रक्रिया तय समय पर पूरी होती है, तो अगले वर्ष देश में सबसे पहले 10 और 20 रुपये के पॉलीमर नोट पायलट आधार पर जारी किए जा सकते हैं। सफल परीक्षण के बाद भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोटों को भी पॉलीमर सामग्री में लाने पर विचार किया जा सकता है।
