

बिलासपुर। सर्पदंश मुआवजा फर्जीवाड़े की जांच में सिम्स से लेकर तहसील कार्यालय तक फैले कथित नेटवर्क की परतें खुलने लगी हैं। पुलिस जांच के अनुसार, सर्पदंश से मौत के मामलों में फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पटवारी प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेज तैयार कर सरकारी मुआवजा दिलाने का संगठित खेल चल रहा था। मामले में सोमवार को दो होमगार्ड जवानों को गिरफ्तार किया गया, जबकि अब तक 15 प्रकरणों में एफआईआर दर्ज कर 11 आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है।
पुलिस के मुताबिक, सिम्स में सर्पदंश से संबंधित शव पहुंचते ही वहां तैनात कुछ कर्मचारियों और होमगार्ड जवानों के माध्यम से सूचना गिरोह तक पहुंचाई जाती थी। इसके बाद अधिवक्ता हीराप्रसाद खांडेकर और उसके सहयोगी सक्रिय होकर मृतकों के परिजनों से संपर्क करते थे। आरोप है कि तहसील से जुड़े दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा कथित तौर पर एक से डेढ़ लाख रुपये लेकर तहसील स्तर पर मुआवजा प्रकरण आगे बढ़ाने और पूरी प्रक्रिया की “सेटिंग” करता था।

शवों से छेड़छाड़ और फर्जी दस्तावेजों का आरोप
जांच में सामने आया है कि कुछ मामलों में शवों पर सर्पदंश के निशान दिखाने के लिए छेड़छाड़ की गई और उसके बाद मर्ग पंचनामा तैयार कराया गया। आरोप है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी हेरफेर कर मौत का कारण सर्पदंश दर्शाया गया। पुलिस को जांच के दौरान कुछ डॉक्टरों के नाम से जारी फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जाली हस्ताक्षर भी मिले हैं। इसके बाद फर्जी पटवारी प्रतिवेदन तैयार कर तहसील में मुआवजा प्रकरण प्रस्तुत किए जाते थे।
मामले में पुलिस ने सोमवार को होमगार्ड जवान रामकुमार पाटनवार (बंधवापारा, सरकंडा) और रामेश्वर भास्कर (सतनाम नगर, अमेरी) को गिरफ्तार किया है।
रीडरों की आईडी से बढ़ाए जाते थे प्रकरण
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि तहसील और एसडीएम कार्यालय में पदस्थ रीडरों की लॉगिन आईडी का उपयोग कर मुआवजा प्रकरणों को आगे बढ़ाया जाता था। मुआवजा स्वीकृत होने के बाद राशि मृतकों के परिजनों के खातों में जमा होती थी, जिसके बाद गिरोह के सदस्य कथित तौर पर परिजनों को कुछ रकम देकर शेष राशि अपने कब्जे में ले लेते थे।
15 मामलों में एफआईआर, 11 आरोपी जेल भेजे गए
पुलिस ने सर्पदंश मुआवजा फर्जीवाड़े के सभी 15 मामलों में धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी दस्तावेज तैयार कर उनका उपयोग करने सहित विभिन्न धाराओं में अपराध दर्ज किया है। पिछले चार दिनों में अधिवक्ता हीराप्रसाद खांडेकर, बैंककर्मी कुश कुमार गुप्ता, तथाकथित वकील महेंद्र कुमार, दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा, डॉ. प्रियंका सोनी, एसडीएम रीडर गरीब राम बिंझवार, नरेंद्र कौशिक, तहसीलदार रीडर हरिशंकर राठौर समेत 11 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है।
डॉ. एस.एन. बोले फरार, पुलिस की तलाश जारी
जांच के दौरान डॉ. प्रियंका सोनी के अलावा डॉ. एस.एन. बोले के नाम से जारी पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी जांच के घेरे में आई है। फर्जी रिपोर्ट सामने आने के बाद डॉ. बोले फरार बताए जा रहे हैं। पुलिस उनके घर पर दबिश दे चुकी है। सिम्स के डीन डॉ. रमणेश मूर्ति ने बताया कि डॉ. बोले की तीन दिन की छुट्टी समाप्त हो चुकी है, लेकिन वे सोमवार को ड्यूटी पर नहीं पहुंचे।
कोनी थाने के मामलों में भी मिली गड़बड़ी
पुलिस के अनुसार, कोनी थाने में दर्ज सर्पदंश के तीनों मामलों में प्रस्तुत पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मर्ग इंटीमेशन और पटवारी प्रतिवेदन में गंभीर अनियमितताएं पाई गई हैं। इन दस्तावेजों के फर्जी होने की आशंका के आधार पर जांच का दायरा बढ़ा दिया गया है।
लिपिक संघ की हड़ताल से प्रभावित रहा कामकाज
तहसील कर्मचारियों की गिरफ्तारी के विरोध में सोमवार को लिपिक संघ ने एक दिन की हड़ताल की। इससे तहसील कार्यालय में सुनवाई और अन्य प्रशासनिक कार्य प्रभावित रहे। संघ ने कलेक्टर और एसपी को ज्ञापन सौंपकर कार्रवाई को एकतरफा बताते हुए निष्पक्ष और व्यापक जांच की मांग की।
एसएसपी बोले—जो भी शामिल होगा, जाएगा जेल
एसएसपी रजनेश सिंह ने कहा कि प्रारंभिक जांच में अधिवक्ता और उसके सहयोगियों द्वारा संगठित तरीके से पूरा नेटवर्क संचालित करने के संकेत मिले हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच में जिन-जिन लोगों की भूमिका सामने आएगी, उनके खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी और किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा।
