
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण फैसले सुनाते हुए वैवाहिक विवाद और सेवा संबंधी मामलों में कानूनी प्रक्रिया के पालन पर जोर दिया है। एक मामले में अदालत ने कहा कि यदि पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध (एडल्ट्री) सिद्ध हो जाता है तो वह पति से भरण-पोषण की हकदार नहीं होगी। वहीं, दूसरे मामले में बिना विभागीय जांच के छात्रा को आपत्तिजनक संदेश भेजने के आरोप में बर्खास्त किए गए शिक्षक की सेवा समाप्ति का आदेश रद्द कर दिया।
अवैध संबंध होने पर गुजारा भत्ता नहीं
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने रायपुर फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए जशपुर निवासी महिला की क्रिमिनल रिवीजन याचिका खारिज कर दी। महिला का विवाह वर्ष 2018 में रायपुर निवासी युवक से हुआ था, लेकिन करीब आठ महीने बाद दोनों अलग हो गए।
महिला ने पति पर दहेज मांगने, चरित्र पर संदेह करने और प्रताड़ित करने के आरोप लगाए थे। वहीं पति ने दावा किया कि पत्नी का किसी अन्य युवक से अवैध संबंध था। पत्नी की ओर से अदालत में यह भी तर्क दिया गया कि जिस ऑडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर फैमिली कोर्ट ने फैसला दिया, वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से तैयार की गई फर्जी रिकॉर्डिंग है और उसके साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र भी नहीं था।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध होने का निष्कर्ष निकाला था और भरण-पोषण का दावा खारिज करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं की।
बिना विभागीय जांच शिक्षक को नहीं किया जा सकता बर्खास्त
एक अन्य मामले में जस्टिस बिभु दत्त गुरु की एकलपीठ ने बिल्हा ब्लॉक के गोडड़िया स्कूल में पदस्थ शिक्षक कमलेश कुमार साहू की बर्खास्तगी का आदेश निरस्त कर दिया।
शिक्षक पर एक छात्रा को आपत्तिजनक व्हाट्सएप संदेश भेजने और वीडियो कॉल करने के गंभीर आरोप लगे थे। इसके आधार पर स्कूल शिक्षा विभाग ने 7 फरवरी 2025 को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के तहत उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया था।
याचिकाकर्ता ने अदालत में कहा कि विभाग ने न तो उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया और न ही विभागीय जांच कराई। हाई कोर्ट ने माना कि बिना विभागीय जांच और पर्याप्त कारण दर्ज किए किसी भी कर्मचारी को सीधे सेवा से हटाना विधिसम्मत नहीं है। अदालत ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द करते हुए विभाग को नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई करने की स्वतंत्रता भी दी है।
दोनों फैसलों में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक और प्रशासनिक कार्रवाई में विधिक प्रावधानों तथा निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
