
शशि मिश्रा

बिलासपुर। अपोलो अस्पताल बिलासपुर में पदस्थ रहे कथित फर्जी हृदय रोग विशेषज्ञ नरेंद्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेंद्र जॉन केम के इलाज से 27 लोगों की मौत और 270 मरीजों की जान जोखिम में पड़ने के आरोपों के बीच पुलिस द्वारा अस्पताल प्रबंधन को क्लीन चिट दिए जाने से नया विवाद खड़ा हो गया है।
पुलिस द्वारा अदालत में चालान पेश करने से पहले तैयार की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि अस्पताल प्रबंधन या चयन समिति ने जानबूझकर आपराधिक षड्यंत्र के तहत आरोपी डॉक्टर की नियुक्ति की थी। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि प्रबंधन के दुराशय या आपराधिक संलिप्तता के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले।
हालांकि, इस निष्कर्ष पर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि अस्पताल प्रबंधन को काफी पहले ही डॉक्टर की डिग्रियां फर्जी होने की जानकारी मिल चुकी थी। इसके बावजूद न तो पुलिस को सूचना दी गई और न ही तत्काल कोई कानूनी कार्रवाई की गई।
तत्कालीन आईएमए अध्यक्ष डॉ. किरण देवरस के अनुसार, जांच समिति के समक्ष अपोलो प्रबंधन ने स्वीकार किया था कि मुख्यालय स्तर पर सत्यापन में डॉक्टर की एमबीबीएस और एमआरसीपी संबंधी डिग्रियां फर्जी पाई गई थीं। यहां तक कि डॉक्टर की पहचान संबंधी जानकारी भी संदिग्ध मिली थी। इसके बावजूद आरोपी डॉक्टर के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई नहीं की गई।

मामले में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अपोलो अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति केवल बायोडाटा के आधार पर की जाती थी। पुलिस को नियुक्ति संबंधी दस्तावेजों के रूप में केवल बायोडाटा उपलब्ध कराया गया, जबकि चयन प्रक्रिया और दस्तावेज सत्यापन को लेकर कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आई। नियुक्ति के समय चयन समिति के अध्यक्ष रहे डॉ. बी. प्रेमकुमार को भी आरोपी नहीं बनाया गया।
इस प्रकरण में कांग्रेस ने अपोलो समूह के शीर्ष पदाधिकारियों के विरुद्ध भी एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी।
हाई कोर्ट अधिवक्ता विनय दुबे का कहना है कि यदि जांच में सामने आए तथ्यों को आधार माना जाए तो फर्जी डॉक्टर की नियुक्ति और उसके द्वारा किए गए उपचार के लिए अस्पताल प्रबंधन की जवाबदेही तय होनी चाहिए। उनका कहना है कि जिन मरीजों की मौत हुई है, उनके परिजनों को उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए तथा सभी प्रभावित मरीजों और उनके परिवारों के बयान लेकर निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए।
राजेंद्र प्रसाद शुक्ला का मामला बना जांच का आधार
प्रकरण में स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद शुक्ला की मौत प्रमुख आधार बनी। अपोलो के रिकॉर्ड के अनुसार उनका 2002 से 2006 के बीच कई बार इलाज हुआ था। 1 जून 2006 को आरोपी डॉक्टर की नियुक्ति के बाद 21 जुलाई 2006 को शुक्ला को अस्पताल में भर्ती कराया गया। 2 अगस्त 2006 को आरोपी डॉक्टर ने एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की। प्रक्रिया के कुछ घंटे बाद उनकी हालत गंभीर हो गई और उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। 20 अगस्त 2006 को उनका निधन हो गया।
वर्ष 2025 में दमोह में फर्जी डिग्री मामले का खुलासा होने के बाद मृतक के पुत्र डॉ. प्रदीप शुक्ला ने बिलासपुर के सरकंडा थाने में आरोपी डॉक्टर और अपोलो प्रबंधन के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई। जांच के बाद पुलिस ने आरोपी डॉक्टर सहित अन्य के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेजों के उपयोग तथा गैर-इरादतन हत्या सहित विभिन्न धाराओं में अपराध दर्ज किया।
अब पुलिस द्वारा अपोलो प्रबंधन को क्लीन चिट दिए जाने से पूरे मामले की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं और पीड़ित परिवारों की ओर से व्यापक जांच तथा जवाबदेही तय किए जाने की मांग तेज हो गई है।
