
शशि मिश्रा

बिलासपुर। शिक्षा का मंदिर यदि स्वयं असुरक्षा का प्रतीक बन जाए, तो यह केवल एक भवन की जर्जरता नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का आईना बन जाता है। बिल्हा विकासखंड के संकुल केंद्र वार्ड क्रमांक 48 बिजौर अंतर्गत शासकीय प्राथमिक शाला कुटीपारा, मोपका का भवन इन दिनों इसी विडंबना की कहानी बयां कर रहा है। दरकी हुई दीवारें, टपकती छत और हर पल मंडराता हादसे का साया—इन सबके बीच मासूम बच्चे रोज शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं।
विद्यालय की प्रधान पाठक का दावा है कि भवन की खस्ताहाल स्थिति को लेकर जिला शिक्षा अधिकारी, कलेक्टर, नगर निगम, स्थानीय पार्षद तथा अन्य संबंधित अधिकारियों को कई बार लिखित आवेदन देकर अवगत कराया गया। उनके अनुसार हर बार केवल आश्वासन मिले, लेकिन भवन की मरम्मत अथवा नए भवन के निर्माण की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
बरसात ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। कक्षाओं की छत से लगातार पानी टपकने के कारण फर्श पर जलभराव की स्थिति बन जाती है। इससे न केवल पढ़ाई बाधित होती है, बल्कि विद्युत दुर्घटना सहित किसी भी अप्रिय घटना की आशंका बनी रहती है। विद्यालय प्रबंधन का कहना है कि ऐसे माहौल में बच्चों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब संबंधित विभागों को विद्यालय की जर्जर स्थिति की जानकारी पहले से थी, तब बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अब तक प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि विकास और शिक्षा की बात करने वाले जनप्रतिनिधियों को अब इस मुद्दे पर गंभीरता से हस्तक्षेप करना चाहिए। उनका मानना है कि बच्चों की सुरक्षा किसी भी कीमत पर समझौते का विषय नहीं हो सकती। केवल आश्वासन नहीं, बल्कि त्वरित और ठोस कार्रवाई ही इस समस्या का स्थायी समाधान है।
यह मामला केवल एक जर्जर स्कूल भवन तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि वर्षों से शिकायतें संबंधित कार्यालयों तक पहुंचती रही हैं, तो समाधान अब तक क्यों नहीं निकल पाया? इन सवालों का जवाब केवल जिम्मेदार अधिकारियों के पास ही नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के पास भी है, जो बच्चों के सुरक्षित भविष्य का दावा करती है।
