

बिलासपुर/घुटकू। शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला कहा जाता है, लेकिन बिलासपुर जिले के तखतपुर विधानसभा क्षेत्र के ग्राम घुटकू के स्टेशनपारा में शिक्षा व्यवस्था की जो तस्वीर सामने आई है, वह सरकारी दावों की हकीकत बयां कर रही है। यहां शासकीय प्राथमिक शाला के नन्हे विद्यार्थी पिछले कई दिनों से खुले आसमान के नीचे पीपल के पेड़ की छांव में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। धूप हो, बारिश हो या पेड़ से गिरते कीड़े—हर परिस्थिति में बच्चों का भविष्य मानो प्रकृति के भरोसे छोड़ दिया गया है।

विद्यालय का मूल भवन वर्षों पहले जर्जर घोषित हो चुका था। इसके बाद पिछले पांच वर्षों से स्कूल एक निजी मकान में संचालित किया जा रहा था। मकान मालिक मुकेश लोनिया ने यह भवन केवल चार महीने के लिए उपलब्ध कराया था, लेकिन विभाग द्वारा वैकल्पिक व्यवस्था नहीं किए जाने और किराया नहीं मिलने के कारण उन्होंने अंततः मकान में ताला लगा दिया। इसके बाद विद्यालय की कक्षाएं सड़क किनारे पीपल के पेड़ के नीचे संचालित की जा रही हैं।
स्थिति इतनी चिंताजनक है कि अभिभावकों का सरकारी शिक्षा व्यवस्था से विश्वास उठने लगा है। परिणामस्वरूप कक्षा पहली और दूसरी में इस वर्ष एक भी नया प्रवेश नहीं हुआ है, जबकि पहली से पांचवीं तक कुल मिलाकर मात्र 10 विद्यार्थी ही अध्ययनरत हैं। यह आंकड़ा शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

विद्यालय की शिक्षिका खगेश्वरी दुबे के अनुसार तेज धूप, बारिश या पेड़ से कीड़े गिरने की स्थिति में पढ़ाई बंद करनी पड़ती है। आसपास किसी शोक कार्यक्रम के आयोजन की स्थिति में भी स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती है। सबसे अधिक परेशानी शौचालय के अभाव में छात्राओं और महिला शिक्षकों को होती है, जिन्हें मजबूरी में तालाब की मेड़ के पास खुले में जाना पड़ता है। विद्यालय की पाठ्यपुस्तकों का वितरण भी इसी पेड़ के नीचे किया गया, जबकि मध्याह्न भोजन रसोइया के घर में तैयार किया जा रहा है।
विद्यालय भवन निर्माण के लिए 23 अप्रैल 2026 को 11.48 लाख रुपये की स्वीकृति भी मिल चुकी है, लेकिन विभागीय उदासीनता और निर्माण कार्य में देरी के कारण आज तक एक ईंट भी नहीं रखी जा सकी। ग्राम पंचायत का कहना है कि बारिश के बाद निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।

जिला शिक्षा अधिकारी रामेश्वर जायसवाल ने बताया कि नए भवन के लिए राशि स्वीकृत है, लेकिन निर्माण कार्य प्रारंभ नहीं हो पाया है। फिलहाल विद्यालय को किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित करने की व्यवस्था की जा रही है।
सरकारी योजनाओं और शिक्षा सुधार के दावों के बीच घुटकू के स्टेशनपारा की यह तस्वीर अनेक सवाल खड़े करती है। जब मासूम बच्चों को सड़क किनारे पेड़ के नीचे बैठकर शिक्षा ग्रहण करनी पड़े, तो यह केवल एक विद्यालय की समस्या नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की संवेदनहीनता का प्रतीक बन जाती है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर स्थिति का समाधान कितनी शीघ्रता से करते हैं या फिर नौनिहालों का भविष्य यूं ही खुले आसमान के नीचे भटकता रहेगा।
