
दिलीप कुमार। बस्ती।
बस्ती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में बस्ती जिले के युवाओं द्वारा मनोरमा नदी की सफाई अभियान की सराहना कर पूरे देश का ध्यान इस ऐतिहासिक नदी की ओर आकर्षित किया। प्रधानमंत्री ने युवाओं की पहल को जनभागीदारी का प्रेरणादायक उदाहरण बताया। लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं अधिक गंभीर है। पड़ताल में सामने आया कि जिस 200 से 300 मीटर हिस्से की सफाई ने देशभर में सुर्खियां बटोरीं, उसके अलावा लगभग पूरी 115 किलोमीटर लंबी मनोरमा नदी आज अतिक्रमण, प्रदूषण, जलकुंभी और प्रशासनिक उपेक्षा से जूझ रही है।
मनोरमा नदी की शुरुआत गोंडा जिले के तिरे ताल से होती है और करीब 115 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद यह बस्ती जिले में कुआनो नदी में मिलती है। आगे चलकर कुआनो नदी घाघरा (सरयू) में समाहित हो जाती है। कभी यह नदी क्षेत्र के हजारों किसानों, पशुपालकों और ग्रामीणों के जीवन का प्रमुख आधार थी, लेकिन आज कई स्थानों पर इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है।
प्रधानमंत्री द्वारा सराहे गए अभियान की शुरुआत बस्ती जिले के लजघाटा गांव के 21 वर्षीय आकाश गुप्ता ने अपने छह साथियों के साथ की। बचपन में जिस नदी के किनारे उन्होंने समय बिताया था, उसी नदी को प्लास्टिक, कूड़े और जलकुंभी से भरा देखकर उन्होंने “नो कम्प्लेंट, ओनली ए फ्रेश स्टार्ट” का संदेश देते हुए सफाई अभियान शुरू किया। युवाओं ने अपने संसाधनों से जाल, टोकरियां और फावड़ों की मदद से करीब दो महीने तक लगातार मेहनत की और 200 से 300 मीटर क्षेत्र को साफ किया। सोशल मीडिया पर उनके वीडियो लाखों लोगों तक पहुंचे और अभियान राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
आकाश गुप्ता का कहना है कि किसी भी नदी को बचाने के लिए केवल कुछ लोगों की मेहनत पर्याप्त नहीं होगी। जब तक समाज और सरकार दोनों मिलकर आगे नहीं आएंगे, तब तक स्थायी समाधान संभव नहीं है। उनका मानना है कि लोगों में जागरूकता बढ़ी है और अब कई लोग इस अभियान से जुड़ना चाहते हैं।
हालांकि, नदी के उद्गम से लेकर अंतिम छोर तक की वास्तविक स्थिति बेहद चिंताजनक है। गोंडा जिले के तिरे ताल क्षेत्र में जहां से मनोरमा नदी निकलती थी, वहां अब नदी का प्राकृतिक स्वरूप लगभग समाप्त हो चुका है। कई स्थानों पर नदी की जमीन को समतल कर खेती की जा रही है। गन्ना और गेहूं की फसलें वहां लहलहा रही हैं जहां कभी नदी बहती थी। कुछ जगहों पर तो नदी के पुराने रास्ते पर सड़क तक बना दी गई है।
जहां नदी का अस्तित्व बचा भी है, वहां पानी का बहाव लगभग खत्म हो चुका है। अधिकांश हिस्सों में पानी ठहर गया है और पूरी सतह जलकुंभी से ढकी हुई दिखाई देती है। कई स्थानों पर पानी काला पड़ चुका है और उससे तेज दुर्गंध आती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले इसी नदी में लोग स्नान करते थे, पशुओं को नहलाते थे और कई जरूरतों के लिए पानी का उपयोग करते थे, लेकिन अब नदी नाले जैसी दिखाई देती है। ग्रामीणों के अनुसार यदि कोई इसमें स्नान कर ले तो शरीर में खुजली जैसी समस्याएं होने लगती हैं।
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा की जा रही मासिक जांच के अनुसार नदी में घुलित ऑक्सीजन (डीओ) का स्तर 8.24 से 8.39 मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच पाया गया है, जो जलीय जीवों के लिए पर्याप्त माना जाता है। हालांकि विभाग के अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि यह पानी पीने योग्य बिल्कुल नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि नदी में घरेलू गंदगी और बिना शोधन के छोड़े जा रहे सीवर के पानी के कारण प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार मनोरमा एक वर्षा आधारित नदी है। इसकी गहराई कम होने और भूजल स्रोतों के कमजोर पड़ने से गर्मियों में इसका प्रवाह लगभग समाप्त हो जाता है। हर्रैया नगर क्षेत्र से निकलने वाला सीवर भी नदी की स्थिति को और खराब कर रहा है। अधिकारियों का कहना है कि इस समस्या के समाधान के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की आवश्यकता है, लेकिन अभी तक यह योजना लंबित है।
सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक स्तर पर दिखाई देने वाली निष्क्रियता को लेकर उठ रहा है। स्थानीय प्रशासन की ओर से फिलहाल मनोरमा नदी के पुनर्जीवन के लिए किसी विशेष योजना, बजट या अभियान की जानकारी सामने नहीं आई है। इससे स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं में निराशा है।
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले कई वर्षों से नदी की सफाई के नाम पर विभिन्न योजनाओं में धन खर्च होने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीन पर अपेक्षित बदलाव दिखाई नहीं देता। उनका आरोप है कि यदि समय रहते अतिक्रमण हटाने, जलकुंभी की नियमित सफाई, सीवर प्रबंधन और जल संरक्षण की ठोस योजना नहीं बनाई गई तो आने वाले वर्षों में मनोरमा नदी का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सकता है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि छोटी नदियों का सूखना केवल एक नदी का संकट नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र के जल संतुलन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। मनोरमा जैसी सहायक नदियां ही बड़ी नदियों को जीवन देती हैं। यदि ये छोटी नदियां खत्म होती रहीं तो भूजल स्तर लगातार नीचे जाता रहेगा और भविष्य में जल संकट और गंभीर हो सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जहां पहले 40 से 50 फीट पर पानी मिल जाता था, वहीं अब कई क्षेत्रों में 150 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है।
मनोरमा नदी की कहानी एक ओर युवाओं की प्रेरणादायक पहल को सामने लाती है तो दूसरी ओर यह भी दिखाती है कि केवल जनभागीदारी से इतनी बड़ी नदी को बचाना संभव नहीं है। इसके लिए सरकार, प्रशासन, विशेषज्ञों और समाज सभी को मिलकर दीर्घकालिक योजना के साथ काम करना होगा। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इतिहास, संस्कृति और पर्यावरण से जुड़ी यह महत्वपूर्ण नदी आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल दस्तावेजों और नक्शों तक ही सीमित रह जाएगी।
