
आकाश दत्त मिश्रा

मुंगेली।
एक समय जो मामला जनआक्रोश का कारण बना, आज वही धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है। मुंगेली का वह पुराना तालाब, जिसे पाटकर जमीन में तब्दील कर दिया गया, अब केवल चर्चा का विषय भर रह गया है—कार्रवाई का नहीं।
शुरुआती विरोध के बाद प्रशासन ने औपचारिकता निभाते हुए काम पर रोक तो लगा दी, लेकिन उसके बाद जो होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। न जांच की गति दिखाई दी, न ही जिम्मेदारों पर कोई सख्ती। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रशासन भी समय के साथ इस मुद्दे को भूल जाने की राह पर है।
यह केवल एक तालाब का मामला नहीं है। यह उस सोच का आईना है, जहां सार्वजनिक संसाधनों की अनदेखी कर निजी लाभ को प्राथमिकता दी जा रही है। जिस जलाशय ने वर्षों तक क्षेत्र के जल स्तर को संभाले रखा, आज उसी को मिटा दिया गया—और हम सब चुप हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल विरोध के समय तक सीमित है? क्या कार्रवाई का अर्थ सिर्फ काम रुकवाना है, या फिर दोषियों को सजा दिलाना और संसाधनों को पुनर्जीवित करना भी उसका हिस्सा है?
जरूरत इस बात की है कि इस मामले को फिर से गंभीरता से उठाया जाए। दोषियों की जवाबदेही तय हो और सबसे महत्वपूर्ण—तालाब को उसके मूल स्वरूप में पुनः खोदकर बहाल किया जाए।
क्योंकि अगर आज एक तालाब यूं ही खत्म हो गया, तो कल किसी और जल स्रोत की बारी होगी।
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने देशभर में तालाबों और जल निकायों के संरक्षण के लिए सख्त रुख अपनाया है।
NGT ने तालाबों पर अवैध अतिक्रमण हटाने, उन्हें मूल स्वरूप में बहाल करने, और सीवेज का पानी रोकने के लिए जिला कलेक्टरों व नगर निकायों को कड़े निर्देश दिए हैं, साथ ही अतिक्रमण करने वालों पर सख्त कार्यवाही किये जाने का आदेश दिया गया है
NGT के मुख्य निर्देश और कार्यवाहीः
अतिक्रमण हटाना: NGT ने कई मौकों पर तालाबों की
भूमि से अतिक्रमण तत्काल हटाने और उन्हें फिर से भरने (जीर्णोद्धार) के निर्देश दिए हैं।
मूल स्वरूप बनाए रखनाः न्यायालय ने आदेश दिया है कि राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार तालाबों का आकार और स्वरूप बना रहना चाहिए, उन्हें व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं दिया जा सकता।
जिले में तालाबों को पाटकर जमीन बनाने का खेल कोई नया नहीं है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस अवैध काम में लिप्त लोग खुलेआम प्रशासन को चुनौती देते नजर आते हैं। वजह साफ है — उनका राजनीतिक रसूख।
सूत्रों के अनुसार, तालाब पाटने वाले कई लोग सीधे तौर पर राजनीति से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि वे प्रशासन के सामने मजबूती से खड़े रहते हैं और कार्रवाई का कोई खास असर उन पर नहीं होता।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि चाहे भाजपा की सरकार हो या कांग्रेस की, इन लोगों का “मैनेजमेंट” हर पार्टी में चलता है। सत्ता बदलती है, लेकिन इन पर कार्रवाई की रफ्तार नहीं बदलती।
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन कई बार कार्रवाई करने की कोशिश करता है, लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते कदम पीछे खींचने पड़ते हैं। नतीजा यह होता है कि तालाब धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या प्रशासन सिर्फ मूकदर्शक बना रहेगा?
या फिर इन प्रभावशाली लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर तालाबों को बचाने की पहल करेगा?
