
आकाश मिश्रा

शनिवार को भारतीय राजनीति में दो बड़ी प्रलयंकारी घटना हुई, जिससे राजनीतिक जगत में भूचाल आ गया है। इस शनिवार को भारतीय जनता पार्टी के लिए काला दिन कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। जंतर मंतर पर जारी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के आगे आखिरकार भाजपा ने नतमस्तक होकर हार स्वीकार कर ली। शीर्षासन करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरकार अपना इस्तीफा दे ही दिया। वह धर्मेंद्र प्रधान, जिन्होंने यूजीसी के विरोध में देशभर में हुए शांतिपूर्ण आंदोलन को ठेंगा बताया था । दूसरी ओर प्रदेश की राजनीति में भी बहुत बड़ी उलट फेर हुई है । जंतर मंतर पर कथित छात्रों पर की गई बर्बरता से आहत होकर भाजपा के शीर्ष नेता रसीद बख्श ने भी शनिवार को इस्तीफा का ऐलान कर दिया, जिससे प्रदेश भाजपा का सिंहासन डोलने लगा है ।
इसी के साथ प्रदेश में सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है । प्रदेश की भाजपा सरकार को कैसे बचाया जाए इस पर मंथन शुरू हो गया है ।
असल में रसीद बख्श आरम्भ से ही मुस्लिम होने के नाते कट्टर कांग्रेसी रहे हैं। उनकी निष्ठा प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के प्रति रही है। इसी क्रम में आगे चलकर अजीत जोगी के करीबी धर्मजीत सिंह के वे समर्पित, निष्ठावान कार्यकर्ता बन गए, लेकिन जब राजनीतिक पद लोलुपता के कारण पहले कांग्रेस और फिर जनता कांग्रेस को भी ठेंगा दिखाकर धर्मजीत सिंह ने भाजपा का दामन थाम लिया तो चाहते ना चाहते हुए भी रसीद बख्श को भगवा झंडा तले कमल खिलाने की जिम्मेदारी लेनी पड़ी।
वे खुद को कट्टर भाजपाई बताने लगे। कहने को तो रसीद बख्श भाजपा के गनियारी मंडल के सक्रिय सदस्य रहे हैं, लेकिन उनकी गिनती हमेशा ही भाजपा के चोटी के राष्ट्रीय नेताओं में होती रही है। वैसे यह सदस्यता उन्हें ऐसे वैसे नहीं बल्कि केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया के माध्यम से मिली थी।
क्या हुआ जो उनके प्रिय नेता अब भी भारतीय जनता पार्टी के तखतपुर के विधायक बने हुए है। वे सरकार का हिस्सा हो और सत्ता सुख लेने में मगन हो लेकिन दिल्ली के जंतर मंतर में नीट पेपर लीक मामले में छात्रो के धरना प्रदर्शन को लेकर जिस तरह से पुलिस ने बर्बरता की, उससे रसीद बख्श के ज्ञान चक्षु खुल गए। उनसे यह दृश्य देखा नहीं गया। उन्हें लगा कि ऐसी बर्बरता तो ना अंग्रेजों के जमाने में हुई थी, ना कभी जलियावाला बाग में और ना ही मुगलो के काल में। भारतीय इतिहास में अगर सर्वाधिक बर्बरता कहीं हुई है तो हालिया कॉकरोच आंदोलन में भारतीय जनता पार्टी की पुलिस ने दिल्ली में की है।

ऐसे में उनका जमीर जाग उठा। शनिवार को उन्होंने आनन फानन में शाम को (जैसा कि अक्सर नहीं होता) प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि केवल वे ही नहीं बल्कि उनके साथ अन्य चार-पांच और भाजपा कार्यकर्ता पार्टी छोड़ने का निर्णय ले चुके हैं।
यह ख़बर जैसी ही लीक हुई भारतीय जनता पार्टी में हाहाकार मच गया । पार्टी के बड़े-बड़े पदाधिकारी सरकार बचाने के प्रयास में जुट गए। गुप्त सूत्रों से पता चला है कि भारतीय जनता पार्टी को किसी भी कीमत पर रसीद बख्श को मना कर भाजपा में वापसी के स्पष्ट निर्देश दिल्ली से मिले हैं, लेकिन बिलासपुर प्रेस क्लब में रसीद बख्श ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब किसी भी कीमत पर भारतीय जनता पार्टी में जाने वाले नहीं है।
वैसे तो रसीद कह रहे हैं कि फिलहाल वे किसी भी राजनीतिक दल में शामिल नहीं होंगे और समाज सेवा ही करेंगे लेकिन जिस तरह से उनका पुराना कांग्रेस प्रेम रहा है उससे लग रहा है जहाज का पंछी आखिर में जहाज में ही जाएगा।
वैसे तो सोशल मीडिया पर वीडियो बिखरे पड़े हैं जिसमें दिख रहा है कि किस तरह से छात्र आंदोलन के नाम पर अराजक तत्व घुस आए थे, जहां नीट पेपर लीक की बात नहीं होती थी बल्कि भारत तेरे टुकड़े होंगे, शरजील इमाम और उमर खालिद जिंदाबाद, सीता का पति नीता के पति को फायदा पहुंचा रहा है, ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद, आरएसएस मुर्दाबाद, सनातन मुर्दाबाद, राम मंदिर क्यों बना, मोदी को गोली मारो, मोदी शाह इस्तीफा दो, भारत को नेपाल बांग्लादेश बनाएंगे जैसी बात हो रही थी। वीडियो में अधनंगी लड़कियां आकर इस कदर गाली गलौज कर रही थी कि शरीफ आदमी सुन भी नहीं सकता। वहां 2500 गुंडे चिन्हित हुए हैं, जिन्होंने जमकर उत्पात मचाया। गाड़ियां तोड़ी । गाड़ियों में आग लगाई। पुलिस पर हमले कर उन्हें घायल कर दिए लेकिन इससे क्या होता है ?
पुलिस को तो सरकार वेतन देती है ना। तनख्वाह शायद इसी मार खाने के लिए ही दी जाती है, इसलिए अगर छात्रों के नाम पर अराजक तत्व घुसकर पुलिस के साथ मारपीट करें, दिल्ली को जलाएं तो क्या हुआ ? भाजपा को उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। क्या हो गया जो कांग्रेस ने रामदेव के शांतिपूर्ण आंदोलन पर लाठी चार्ज कर उन्हें भागने को मजबूर किया था लेकिन भारतीय जनता पार्टी तो बुद्ध को मानने वाली पार्टी है ना, इसलिए उसे इस तरह की कोई कार्यवाही नहीं करनी चाहिए थी।
रसीद बख्श को शायद इस बात पर थोड़ी बहुत शांति मिली होगी कि इस पूरे मामले के असली खलनायक धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को इस्तीफा दे दिया लेकिन इतना भर से रसीद बख्श का क्रोध शांत नहीं हुआ। दुर्वासा मुनि की तरह उन्होंने क्रोध की अग्नि में जलते हुए अपना इस्तीफा भाजपा के मुंह पर दे मारा है। इससे केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं , केंद्र की भाजपा सरकार भी खतरे में आ गई है । अब कितने दिन दोनों जगह पर यह सरकार चल पाएगी कहना मुश्किल है। इसलिए लगता है कि अब भारतीय जनता पार्टी का एकमात्र लक्ष्य किसी तरह से रसीद बख्श को मना कर पार्टी में वापसी कराना होगा। नहीं तो उनकी उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। शायद इसके लिए धर्मजीत सिंह का भी सहारा लेना पड़े। लेकिन शनिवार को जिस तरह से बिलासपुर के पत्रकारों ने रसीद बख्श के तेवर देखे हैं, उससे लगता नहीं कि वे मोदी से कम पर किसी की बात मानने को तैयार होंगे। इसलिए संभव है कि बहुत जल्दी ही अमित शाह और मोदी बिलासपुर आए और किसी तरह से रसीद बख्श को मना कर उन्हें दोबारा भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दिलाये। हो सकता है उन्हें बड़ा पद भी ऑफर किया जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारतीय जनता पार्टी की विदाई तय है। इसलिए शनिवार को भारतीय राजनीतिक और खेल जगत की बड़ी घटनाएं भी इस खबर के सामने दब गई और पूरे बिलासपुर समेत छत्तीसगढ़ और भारत में केवल रसीद बख्श के इस्तीफा की ही चर्चा होती रही। हे भगवान! पता नहीं यह संकट कब और कैसे टलेगा।
