
शशि मिश्रा

बिलासपुर। स्मार्ट सिटी का तमगा मिलने के वर्षों बाद भी शहर के सबसे महत्वपूर्ण व्यावसायिक क्षेत्र नेहरू चौक और उसके आसपास कई शासकीय एवं अर्धशासकीय भवन आज भी जर्जर, अनुपयोगी और खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी जमीनें वर्षों से बेकार पड़ी हैं, जबकि शहर लगातार व्यापारिक विस्तार, पार्किंग, कार्यालय और आधुनिक सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में इन अनुपयोगी परिसरों को ढहाकर उनकी जगह अत्याधुनिक बहुमंजिला शॉपिंग कॉम्प्लेक्स एवं आवासीय परिसर विकसित करने की मांग जोर पकड़ने लगी है।
शहर के विकास और सरकारी राजस्व में वृद्धि के उद्देश्य से यह मांग उठ रही है कि नेहरू चौक सहित शहर के अन्य प्रमुख स्थानों पर स्थित जर्जर एवं खाली पड़े सरकारी भवनों तथा बड़े भूखंडों के बेहतर उपयोग के लिए एक समग्र कार्ययोजना तैयार कर राज्य शासन को प्रस्ताव भेजा जाए। जानकारों का मानना है कि शहर के बीचों-बीच स्थित कई भवन वर्षों से या तो पूरी तरह खाली पड़े हैं या इतनी खराब स्थिति में पहुंच चुके हैं कि उनका उपयोग लगभग समाप्त हो चुका है। कुछ परिसरों पर संबंधित विभागों का अधिकार तो है, लेकिन उनका कोई प्रभावी उपयोग नहीं हो रहा।
विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे पहले इन भवनों का तकनीकी परीक्षण कराया जाए और जो संरचनाएं अनुपयोगी, जर्जर अथवा खतरनाक घोषित हों, उन्हें नियमानुसार हटाकर वहां आधुनिक बहुमंजिला व्यावसायिक परिसर विकसित किए जाएं। इन परिसरों में सैकड़ों दुकानों के साथ कार्यालय, बैंक, फूड कोर्ट, पर्याप्त पार्किंग, लिफ्ट, अग्निशमन व्यवस्था, सीसीटीवी आधारित सुरक्षा और अन्य आधुनिक नागरिक सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं।
इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इससे स्थानीय व्यापार को नई गति मिलेगी, नए निवेश आकर्षित होंगे तथा युवाओं के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। दुकानों के आवंटन और किराये से सरकार को वर्षों तक स्थायी एवं नियमित राजस्व प्राप्त हो सकेगा। इतना ही नहीं, इन बहुमंजिला परिसरों के ऊपरी हिस्से में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आधुनिक आवासीय परिसर भी विकसित किए जा सकते हैं। इससे कार्यालय और आवास एक ही परिसर में उपलब्ध होने से प्रशासनिक कार्यों में सुविधा बढ़ेगी तथा सरकारी संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग हो सकेगा।
शहरी विकास से जुड़े विशेषज्ञों का सुझाव है कि इतनी बड़ी परियोजना को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर विकसित किया जाए। इससे शासन पर एकमुश्त वित्तीय भार नहीं पड़ेगा, निजी निवेश के माध्यम से आधुनिक गुणवत्ता का निर्माण कार्य निर्धारित समय सीमा में पूरा किया जा सकेगा और परियोजना का संचालन भी अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगा।
नागरिकों का कहना है कि स्मार्ट सिटी का अर्थ केवल सड़क चौड़ीकरण, रंग-रोगन या सौंदर्यीकरण तक सीमित नहीं होना चाहिए। शहर के बीचों-बीच करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी जमीनों और भवनों को वर्षों तक खंडहर बने रहने देना न तो विकास की सोच है और न ही सार्वजनिक संपत्तियों का जिम्मेदार उपयोग। इन परिसरों को आधुनिक व्यावसायिक केंद्रों में बदलकर न केवल शहर की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दी जा सकती है, बल्कि सरकारी आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।
शहरवासियों का मानना है कि यदि राज्य शासन इस दिशा में सकारात्मक पहल करते हुए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कराता है और चरणबद्ध तरीके से परियोजना को लागू करता है, तो आने वाले वर्षों में नेहरू चौक सहित ऐसे सभी प्रमुख क्षेत्र आधुनिक व्यावसायिक गतिविधियों के बड़े केंद्र बन सकते हैं। इससे बिलासपुर की आर्थिक गतिविधियों को नई रफ्तार मिलेगी, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, शहर का स्वरूप बदलेगा और स्मार्ट सिटी की अवधारणा को वास्तविक अर्थों में नई पहचान मिलेगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर शहर के सबसे कीमती भूखंडों पर बने जर्जर सरकारी भवन कब तक विकास में बाधा बने रहेंगे? क्या सरकार इन खंडहरों को ढोती रहेगी, या फिर इन्हें आधुनिक व्यावसायिक परिसरों में बदलकर बिलासपुर के भविष्य की नई तस्वीर तैयार करेगी?
