

बिलासपुर। जिले में सामने आए कथित सर्पदंश मुआवजा घोटाले में प्रशासन ने कार्रवाई तेज करते हुए शहर के चार अलग-अलग थानों में 14 एफआईआर दर्ज कराई हैं। हालांकि मामला बेहद संवेदनशील मानते हुए इन प्रकरणों को सिटीजन पोर्टल पर ब्लॉक कर दिया गया है। चार दिन बीत जाने के बाद भी प्रशासनिक अधिकारी विस्तृत जानकारी साझा करने से बच रहे हैं। इस बीच जांच में कई तहसीलदारों और जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के दायरे में बताई जा रही है।
मामले ने उस समय तूल पकड़ा था जब बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने विधानसभा में आंकड़ों के साथ दावा किया कि सर्पदंश के लिए प्रसिद्ध जशपुर जिले की तुलना में बिलासपुर में कहीं अधिक सर्पदंश से मौतें दर्ज की गई हैं। इसके बाद शासन ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच के निर्देश दिए। शुरुआत में जांच धीमी रही, लेकिन शासन के सख्त रुख के बाद हाल ही में जांच पूरी कर एफआईआर दर्ज कराई गई।
जानकारी के अनुसार बिलासपुर तहसील के तहसीलदार प्रकाश साहू की जांच रिपोर्ट के आधार पर कोनी, सरकंडा, कोतवाली और तोरवा थानों में अलग-अलग प्रकरण दर्ज किए गए हैं। हालांकि प्रशासन ने अब तक एफआईआर की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।
ड्राइवर और वकील को बनाया गया मुख्य आरोपी
सूत्रों के अनुसार इस मामले में तहसीलदार के ड्राइवर गोविंद विश्वकर्मा और खांडेकर नामक एक अधिवक्ता को मुख्य आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि अधिवक्ता फर्जी सर्पदंश मामलों की पहचान कर उन्हें तैयार करता था, जबकि कंप्यूटर का जानकार ड्राइवर पूरी ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी करता था। जांच में सामने आया है कि सिंडिकेट ने पटवारी प्रतिवेदन, पुलिस की मर्ग रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक कथित रूप से फर्जी तैयार कर प्राकृतिक आपदा राहत राशि स्वीकृत कराई।
चार लाख रुपए मुआवजे का है प्रावधान
शासन के नियमों के अनुसार सर्पदंश से मृत्यु होने पर मृतक के परिजनों को प्राकृतिक आपदा राहत मद से चार लाख रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। इसके लिए तहसीलदार के निर्देश पर पटवारी प्रतिवेदन तैयार करता है। इसके बाद राजस्व न्यायालय में प्रकरण दर्ज कर परिजनों के शपथ पत्र लिए जाते हैं। संबंधित थाने से मर्ग डायरी तथा अस्पताल से पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त कर दस्तावेजों का सत्यापन किया जाता है। पूरी प्रक्रिया के बाद फाइल एसडीएम और फिर अंतिम स्वीकृति के लिए कलेक्टर अथवा अपर कलेक्टर के पास भेजी जाती है।
कई तहसीलदारों की भूमिका पर सवाल
जांच के दौरान उन अधिकारियों के नाम भी सामने आ रहे हैं जिनके कार्यकाल में बड़ी संख्या में मुआवजा राशि स्वीकृत की गई। इनमें मुकेश देवांगन, शेषनारायण जायसवाल, अतुल वैष्णव, गरिमा ठाकुर और प्रकृति ध्रुव के नाम चर्चा में हैं। इसके अलावा जिला प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका भी संदिग्ध बताई जा रही है। हालांकि अभी तक किसी अधिकारी के खिलाफ आधिकारिक रूप से आरोप तय नहीं किए गए हैं और जांच जारी है।
राजस्व मामलों के जानकारों का कहना है कि प्राकृतिक आपदा राहत की राशि स्वीकृत करने की प्रक्रिया बहुस्तरीय होती है। ऐसे में बिना दस्तावेजों के परीक्षण और सक्षम अधिकारियों की स्वीकृति के भुगतान संभव नहीं होता। इसलिए जांच आगे बढ़ने पर कई और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट हो सकती है।
एसडीएम बोले- थानों से मिल सकती है जानकारी
एसडीएम मनीष साहू ने कहा कि सर्पदंश मुआवजा प्रकरणों में एफआईआर शहर के अलग-अलग थानों में दर्ज कराई गई है। विस्तृत जानकारी संबंधित थानों से प्राप्त की जा सकती है।
