बिलासपुर के शोधार्थी की बड़ी उपलब्धि: बिना बायोप्सी सांस और यूरिन से कैंसर पहचानने वाली सेंसर तकनीक विकसित


बिलासपुर, छत्तीसगढ़। ब्रेस्ट कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की पहचान अब जटिल और महंगी प्रक्रियाओं के बिना संभव हो सकेगी। बिलासपुर स्थित शासकीय ई. राघवेन्द्र राव स्नातकोत्तर विज्ञान महाविद्यालय (साइंस कॉलेज) के भौतिकी विभाग के शोधार्थी नायाब उल मलिक ने एक ऐसी उन्नत सेंसर तकनीक विकसित की है, जो केवल सांस और यूरिन के नमूनों के आधार पर कैंसर के शुरुआती संकेतों का पता लगा सकती है।
इस महत्वपूर्ण शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है और इसे Chinese Journal of Physics में प्रकाशित किया गया है। यह शोध डॉ. केपी तिवारी के निर्देशन में पूरा किया गया है।
वाष्पशील जैविक यौगिकों से पहचान
इस तकनीक की विशेषता यह है कि यह शरीर से निकलने वाले वाष्पशील जैविक यौगिकों (VOCs) की पहचान करती है, जो ब्रेस्ट कैंसर के प्रमुख बायोमार्कर माने जाते हैं। शोध के अनुसार, जब शरीर में कैंसर विकसित होता है, तो इन यौगिकों की संरचना में परिवर्तन होता है। विकसित सेंसर इन बदलावों को तुरंत पकड़कर बीमारी के प्रारंभिक चरण में ही संकेत दे सकता है।
शोधार्थी नायाब के अनुसार, वर्तमान जांच तकनीकों में अक्सर कैंसर का पता देर से चलता है, जिससे उपचार जटिल हो जाता है। इसी कमी को दूर करने के उद्देश्य से यह शोध किया गया।
फॉस्फोरस-डॉप्ड नैनो मैटेरियल का उपयोग
इस तकनीक में फॉस्फोरस-डॉप्ड SnS₂ मोनोलेयर नामक 2D नैनो मैटेरियल का उपयोग किया गया है। यह अत्यंत पतला और संवेदनशील पदार्थ है, जिसमें फॉस्फोरस मिलाने से इसके इलेक्ट्रॉनिक गुणों में परिवर्तन होता है। इसके परिणामस्वरूप यह एक प्रभावी रेसिस्टिव बायो-सेंसर के रूप में कार्य करता है।
सेंसर शरीर से निकलने वाले कैंसर-संबंधित यौगिकों के संपर्क में आने पर अपने विद्युत प्रतिरोध में बदलाव करता है। इस परिवर्तन को मापकर यह निर्धारित किया जा सकता है कि कैंसर से जुड़े बायोमार्कर मौजूद हैं या नहीं।
पारंपरिक जांच से सस्ता और तेज विकल्प
विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान में ब्रेस्ट कैंसर की जांच के लिए मैमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड और एमआरआई जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जबकि पुष्टि के लिए बायोप्सी आवश्यक होती है, जो महंगी और समय लेने वाली प्रक्रिया है। नई तकनीक इन जटिलताओं को कम कर सकती है और शुरुआती स्तर पर बीमारी की पहचान आसान बना सकती है।
डॉ. केपी तिवारी का कहना है कि यदि किसी भी कैंसर का प्रारंभिक अवस्था में पता चल जाए, तो उपचार की सफलता कई गुना बढ़ जाती है। ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देर से पहचान होने पर जोखिम बढ़ जाता है।
अगला कदम: पेटेंट और व्यावहारिक उपयोग
शोध टीम अब इस तकनीक के पेटेंट की दिशा में आगे बढ़ रही है। पेटेंट प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसे उद्योगों के साथ जोड़कर व्यावहारिक उपयोग में लाने की योजना है। यह नवाचार भविष्य में कैंसर जांच को सरल, सुलभ और किफायती बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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