

बिलासपुर। खाद्य सुरक्षा मानकों के उल्लंघन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने तारबाहर चौक स्थित महेश स्वीट्स के संचालक महेश चौकसे पर लगाए गए 1 लाख रुपये के जुर्माने को बरकरार रखा है। अदालत ने संचालक द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया।
मामला वर्ष 2011 का है, जब खाद्य विभाग की टीम ने 15 अक्टूबर को महेश स्वीट्स की निर्माण इकाई में निरीक्षण किया था। जांच के दौरान ‘अरारोट’ के नाम पर रखे गए पदार्थ का सैंपल लेकर परीक्षण के लिए रायपुर स्थित प्रयोगशाला भेजा गया। रिपोर्ट में पाया गया कि संबंधित पदार्थ वास्तव में मक्का स्टार्च था, जिसे अरारोट के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था।
मिस ब्रांडिंग मानते हुए कार्रवाई
जांच में गड़बड़ी सामने आने के बाद प्रशासन ने इसे ‘मिस ब्रांडिंग’ की श्रेणी में रखते हुए संचालक पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। इस निर्णय को पहले सत्र न्यायालय में चुनौती दी गई, जहां अपील खारिज होने के बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।
सुनवाई के दौरान संचालक की ओर से तर्क दिया गया कि वे उत्पाद के निर्माता नहीं, बल्कि केवल उपयोगकर्ता हैं, इसलिए उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई उचित नहीं है। साथ ही, सैंपल की जांच रायपुर के बजाय किसी अन्य मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला, जैसे गाजियाबाद में कराने की मांग भी की गई।
हाई कोर्ट ने तर्क खारिज किए
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 की धारा 26(2) के तहत खाद्य सामग्री को रखने और उपयोग करने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह गुणवत्ता और मानकों का पालन सुनिश्चित करे।
अदालत ने यह भी माना कि रायपुर स्थित प्रयोगशाला और वहां के अधिकारी विधिवत अधिकृत हैं, इसलिए उनकी जांच रिपोर्ट पूरी तरह वैध और स्वीकार्य है।
मिस ब्रांडिंग को बताया दंडनीय अपराध
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी उत्पाद को गलत नाम या पहचान के साथ प्रस्तुत करना कानूनन ‘मिस ब्रांडिंग’ है और यह एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।
अदालत ने सत्र न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए संचालक की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही अब महेश स्वीट्स के संचालक को 1 लाख रुपये का जुर्माना अदा करना होगा।
