हिचकोलों पर दौड़ती ज़िंदगी: दुर्ग–बाकल रेलखंड की बदहाल पटरी ने खोली सुरक्षा दावों की पोल


बिलासपुर/दुर्ग। यात्रियों की सुरक्षा और सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे करने वाली रेलवे व्यवस्था की हकीकत एक यात्री के अनुभव ने उजागर कर दी है। दुर्ग से बाकल तक की एक सामान्य रेल यात्रा उस दिन भय और असुरक्षा का प्रतीक बन गई, जब ट्रेन पटरियों पर नहीं, बल्कि मानो हादसे के मुहाने पर दौड़ती महसूस हुई।


यात्री के अनुसार, ट्रेन के रवाना होते ही कुछ मिनटों तक सब सामान्य रहा, लेकिन जल्द ही डिब्बों में असामान्य झटकों का सिलसिला शुरू हो गया। हर जोड़ और मोड़ पर इतने तेज हिचकोले लगे कि यात्रियों का संतुलन बिगड़ने लगा। ऊपर रखे सामान बार-बार गिरने लगे, बच्चे सहम गए और पूरे डिब्बे में डर का माहौल बन गया।


शुरुआत में इसे “सामान्य” मानकर नजरअंदाज किया गया, लेकिन हालात बिगड़ते गए। यात्रियों ने इसे रेलवे की लापरवाही और ट्रैक में लंबे समय से मरम्मत न होने का परिणाम बताया। खिड़की से बाहर देखने पर कई जगह पटरियों की हालत भी संदिग्ध नजर आई, जिससे यह आशंका और गहरी हो गई कि कहीं कोई बड़ा हादसा न हो जाए।


सबसे गंभीर सवाल यह है कि इतनी खराब स्थिति के बावजूद न तो किसी तरह का निरीक्षण दिखा, न ही कोई त्वरित सुधार की कोशिश। यात्रियों का कहना है कि यह स्थिति अचानक नहीं बनी, बल्कि वर्षों की अनदेखी और लापरवाही का नतीजा है।
एक बुजुर्ग यात्री की टिप्पणी इस पूरी व्यवस्था पर करारा तमाचा साबित होती है—“हादसा होने के बाद ही सिस्टम जागता है।” यह बयान न सिर्फ यात्रियों की मानसिक स्थिति को दर्शाता है, बल्कि रेलवे प्रबंधन की संवेदनहीनता पर भी सवाल खड़े करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के लगातार झटके ट्रैक में खराबी, वेल्डिंग की कमजोरी या रखरखाव की कमी का संकेत हो सकते हैं, जो भविष्य में बड़े रेल हादसों का कारण बन सकते हैं। इसके बावजूद यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो यह लापरवाही किसी बड़ी त्रासदी में बदल सकती है।


यह घटना कोई एक दिन या एक ट्रेन की समस्या नहीं है, बल्कि उस व्यापक संकट की ओर इशारा करती है, जिसमें यात्रियों की सुरक्षा से अधिक उपेक्षा और औपचारिकता हावी है।
अब सवाल यह है कि क्या रेलवे प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, या इस चेतावनी को गंभीरता से लेकर ट्रैक और ट्रेनों की स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाएगा?


यात्रियों ने मांग की है कि संबंधित रेलखंड की तत्काल तकनीकी जांच कराई जाए, दोषियों पर कार्रवाई हो और नियमित मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाए। क्योंकि अगला “हिचकोला” केवल असुविधा नहीं, बल्कि जानलेवा भी साबित हो सकता है।

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