

बिलासपुर। अपोलो अस्पताल में वर्षों पहले कार्यरत रहे कथित फर्जी डॉक्टर नरेंद्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेंद्र जॉन केम के मामले में अस्पताल प्रबंधन को पुलिस द्वारा क्लीन चिट दिए जाने पर नया विवाद खड़ा हो गया है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय पं. राजेंद्र प्रसाद शुक्ला के पुत्र डॉ. प्रदीप शुक्ला ने मामले की सीबीआई जांच की मांग करते हुए कहा है कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।
डॉ. प्रदीप शुक्ला का कहना है कि वर्ष 2005-06 के दौरान अपोलो अस्पताल में कार्यरत रहे कथित फर्जी डॉक्टर के इलाज और ऑपरेशन से उनके पिता सहित 27 लोगों की मौत हुई थी, जबकि करीब 270 मरीजों की जान जोखिम में पड़ी। पिछले वर्ष दमोह से आरोपी की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने उसकी पहचान की थी और अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज कराई थी।
हालांकि पुलिस ने अदालत में चालान पेश करने से पहले अस्पताल प्रबंधन को क्लीन चिट दे दी। जांच में पुलिस का कहना है कि अस्पताल प्रबंधन या चयन समिति द्वारा किसी आपराधिक षड्यंत्र के तहत जानबूझकर आरोपी की नियुक्ति किए जाने के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले हैं।
जांच रिपोर्ट पर उठाए सवाल
डॉ. प्रदीप शुक्ला ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि तत्कालीन आईएमए अध्यक्ष डॉ. किरण देवरस की जांच में यह सामने आया था कि अपोलो के मद्रास मुख्यालय को डॉक्टर की एमबीबीएस और एमआरसीपी डिग्रियों के फर्जी होने की जानकारी पहले ही मिल गई थी। इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने न तो कोई कानूनी कार्रवाई की और न ही डॉक्टर को हटाने के लिए आवश्यक कदम उठाए।
उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस को अस्पताल की ओर से नियुक्ति संबंधी केवल बायोडाटा उपलब्ध कराया गया है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या इतने बड़े अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति केवल बायोडाटा के आधार पर की जाती है।
“प्रबंधन भी जिम्मेदार”
डॉ. प्रदीप शुक्ला ने कहा कि जब एक चपरासी की नियुक्ति से पहले उसके दस्तावेजों का सत्यापन किया जाता है, तब एक विशेषज्ञ डॉक्टर की नियुक्ति बिना सत्यापन कैसे हो सकती है। उनके अनुसार अस्पताल प्रबंधन की जवाबदेही तय किए बिना उसे क्लीन चिट देना उचित नहीं है।
उन्होंने मामले की सीबीआई से स्वतंत्र जांच कराने की मांग दोहराते हुए कहा कि यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो वे न्याय के लिए अदालत का रुख करेंगे।
