सरकारी सामुदायिक भवन को पैतृक संपत्ति बताकर ढहाया, आरोपी पर एफआईआर दर्ज

बिलासपुर। नेहरू नगर स्थित सरकारी सामुदायिक भवन को निजी पैतृक संपत्ति बताकर ढहाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि कुदुदंड निवासी मोहम्मद अली ने भवन को अपना 80 वर्ष पुराना पैतृक मकान बताकर सिटी मजिस्ट्रेट से उसे तोड़ने की अनुमति प्राप्त कर ली। प्रशासनिक आदेश के बाद भवन का आधे से अधिक हिस्सा ढहा दिया गया। बाद में भवन के सरकारी होने का खुलासा होने पर निर्माण कार्य रुकवाया गया और आरोपी के खिलाफ सिविल लाइन थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई।

जानकारी के अनुसार नेहरू नगर में हाउसिंग बोर्ड द्वारा सार्वजनिक उपयोग के लिए सामुदायिक भवन का निर्माण कराया गया था। मोहम्मद अली ने सिटी मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देकर दावा किया कि संबंधित भूमि पर स्थित भवन उसकी पैतृक संपत्ति है, जो अत्यंत जर्जर हो चुकी है और कभी भी गिर सकती है। आवेदन पर सुनवाई करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट रजनी भगत ने तहसीलदार और पटवारी से प्रतिवेदन मांगा।

बताया गया कि राजस्व अधिकारियों ने भवन की स्थिति का निरीक्षण कर अपनी रिपोर्ट में इसे जर्जर और असामाजिक तत्वों का अड्डा बताया, लेकिन भवन के मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेजों की जांच नहीं की। इसी रिपोर्ट के आधार पर सिटी मजिस्ट्रेट ने भवन को हटाने का आदेश जारी कर दिया।

आदेश मिलते ही मोहम्मद अली ने भवन में तोड़फोड़ शुरू कर दी। इसी दौरान वार्ड पार्षद कार्तिक यादव की नजर भवन तोड़े जाने पर पड़ी। उन्होंने तत्काल इसकी जानकारी हाउसिंग बोर्ड के अधिकारियों को दी। सूचना मिलते ही गृह निर्माण मंडल के अधिकारी मौके पर पहुंचे और तोड़फोड़ रुकवाई, लेकिन तब तक भवन का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा ध्वस्त किया जा चुका था। भवन के खिड़की-दरवाजे भी निकाल लिए गए थे।

हाउसिंग बोर्ड के सब-इंजीनियर संत्री घोरे की शिकायत पर सिविल लाइन पुलिस ने मोहम्मद अली के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि भवन के स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन किए बिना ध्वस्तीकरण का आदेश जारी कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि आदेश जारी करने वाली सिटी मजिस्ट्रेट रजनी भगत पूर्व में भी विभिन्न विवादों को लेकर चर्चा में रह चुकी हैं। हालांकि वर्तमान मामले में प्रशासन की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

पुलिस और संबंधित विभाग अब यह जांच कर रहे हैं कि सरकारी भवन को निजी संपत्ति बताकर अनुमति कैसे हासिल की गई और इस पूरे घटनाक्रम में किन स्तरों पर लापरवाही हुई।

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