
आकाश दत्त मिश्रा

बिलासपुर। पथलगांव निवासी 20 वर्षीय मेहुल सिंह की सड़क हादसे में मौत हो गई। मेहुल बिलासपुर के CMD कॉलेज में अंतिम वर्ष का छात्र था। उसके माता-पिता दोनों पथलगांव में शिक्षक के पद पर पदस्थ हैं। मेहुल की असमय मौत ने परिवार, मित्रों और परिचितों को गहरे सदमे में डाल दिया है।

जानकारी के अनुसार, करीब छह महीने पहले ही मेहुल के जन्मदिन पर उसे एक नई बाइक उपहार स्वरूप दी गई थी। बुधवार शाम बिलासपुर में तेज बारिश के बीच मेहुल अपनी बाइक से सत्यम चौक से IG चौक की ओर जा रहा था। इसी दौरान बर्जेश स्कूल के गेट के पास उसकी बाइक अचानक अनियंत्रित होकर एक पेड़ से जा टकराई। टक्कर इतनी भीषण थी कि वह मौके पर ही अचेत हो गया।
घटना होते ही आसपास के लोगों की भीड़ जमा हो गई। इसी दौरान वहां मौजूद अपोलो अस्पताल में पदस्थ डॉ. रितेश खन्ना ने बिना समय गंवाए मेहुल को CPR देना शुरू कर दिया और लोगों से मदद की अपील की। वहीं मौके पर पहुंचे धनंजय गोस्वामी ने तत्काल पुलिस सहायता बुलवाई तथा अपनी निजी कार से डॉ. खन्ना के साथ मेहुल को सिम्स अस्पताल पहुंचाया।
रास्ते भर डॉ. खन्ना लगातार CPR देते रहे और कृत्रिम श्वसन के माध्यम से उसकी सांसें लौटाने का प्रयास करते रहे। जिसमे वे दो बार सफल भी हुए।
सिम्स अस्पताल पहुंचने के बाद उपचार प्रक्रिया शुरू की गई। इस दौरान डॉ. खन्ना ने अस्पताल स्टाफ के सहयोग से आवश्यक चिकित्सकीय प्रक्रियाएं भी प्रारंभ करवाईं। वहीं धनंजय गोस्वामी ने मेहुल की पहचान और परिजनों की जानकारी जुटाकर परिवार को घटना की सूचना दी।
डॉक्टरों और मौजूद लोगों की तमाम कोशिशों के बावजूद मेहुल को बचाया नहीं जा सका। देर रात तक धनंजय गोस्वामी अस्पताल में मौजूद रहे और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मेहुल का शव परिजनों को सौंपा गया।
हालांकि यह प्रयास मेहुल की जान नहीं बचा सके, लेकिन डॉ. रितेश खन्ना और धनंजय गोस्वामी द्वारा दिखाई गई मानवीय संवेदनशीलता और तत्परता समाज के लिए एक बड़ा संदेश छोड़ गई। अक्सर सड़क हादसों के बाद लोग तमाशबीन बनकर खड़े रह जाते हैं, लेकिन इन दोनों ने मूक दर्शक बनने के बजाय मदद का हाथ बढ़ाया और अंतिम क्षण तक एक अनजान युवक की जिंदगी बचाने के लिए संघर्ष करते रहे।
यह घटना बताती है कि दुर्घटना के बाद के शुरुआती कुछ मिनट कितने महत्वपूर्ण होते हैं। यदि अधिक से अधिक लोग ऐसे समय में आगे आकर मदद करें, तो कई अनमोल जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। मेहुल भले ही इस दुनिया में नहीं रहा, लेकिन उसकी आखिरी लड़ाई में इंसानियत की जो मिसाल देखने को मिली, वह समाज को संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देती है।
