खसरा 738 का बड़ा खेल? 34 साल पुराने पट्टे पर उठे गंभीर सवाल, जांच रिपोर्ट ने खोले कई राज,पुश्तैनी जमीन में कटौती, विवादित त्रुटि सुधार और राजस्व अभिलेखों की विसंगतियों ने बढ़ाई प्रशासन की मुश्किलें

संवाददाता/सौरभ साहू
दिनांक 30/05/2026,
भैयाथान जिला सूरजपुर छत्तीसगढ़।।

सूरजपुर/भटगांव:– जिले के भटगांव क्षेत्र अंतर्गत ग्राम चन्द्रमेढ़ा और कटिंदा की सीमा से जुड़ा एक पुराना भूमि विवाद इन दिनों फिर चर्चा के केंद्र में है। वर्ष 1992 में जारी पट्टे, वर्ष 2011-12 में किए गए बंदोबस्त त्रुटि सुधार तथा उसके बाद हुए नामांतरण को लेकर उठे सवालों ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है। प्रकरण से जुड़े दस्तावेज, पंचनामा और राजस्व विभाग की जांच रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों ने कई नई आशंकाओं को जन्म दिया है।

जानकारी के अनुसार ग्राम कटिंदा निवासी प्रदीप पैकरा ने कलेक्टर एवं अपर कलेक्टर न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर आरोप लगाया है कि उनकी पुश्तैनी भूमि के हिस्से को अभिलेखों में संशोधन कर दूसरे व्यक्ति के नाम दर्ज कर दिया गया। आवेदक का दावा है कि उनके पूर्वजों की भूमि पुराने खसरा नंबर 444, 445, 446 एवं 447 में कुल 1.044 हेक्टेयर रकबे में दर्ज थी, लेकिन बंदोबस्त और बाद की कार्यवाहियों के दौरान भूमि के नक्शे और रकबे में बदलाव कर दिया गया।

दूसरी ओर राजस्व अभिलेखों के अनुसार ग्राम चन्द्रमेढ़ा निवासी कविन्द्रनाथ को वर्ष 1992 में पुराने खसरा नंबर 131/2 की लगभग 0.101 हेक्टेयर भूमि का पट्टा प्रदान किया गया था। बाद में वर्ष 2011-12 में बंदोबस्त त्रुटि सुधार के माध्यम से उक्त भूमि को नवीन खसरा नंबर 738 के रूप में दर्ज किया गया। इसी कार्रवाई को लेकर विवाद खड़ा हुआ और मामला न्यायालय तक पहुंच गया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए वर्ष 2016 में अतिरिक्त तहसीलदार के निर्देश पर विस्तृत स्थल जांच कर पंचनामा तैयार किया गया। जांच के दौरान पुराने और नए नक्शों का मिलान किया गया तथा दोनों गांवों के ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और सीमावर्ती कृषकों की उपस्थिति में वास्तविक स्थिति का परीक्षण किया गया। जांच में यह तथ्य सामने आया कि नवीन बंदोबस्त के दौरान आवेदक की भूमि का रकबा पहले ही कम हो चुका था। इसके बाद किए गए त्रुटि सुधार के कारण लगभग 0.10 हेक्टेयर भूमि और प्रभावित हुई।

स्थल निरीक्षण में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। जांच दल ने पाया कि जिस भूमि को पट्टे की भूमि बताया जा रहा है, उसके एक हिस्से पर वर्तमान में शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला, जनशिक्षा केन्द्र, बाउंड्रीवाल तथा सीसी सड़क निर्मित है। वहीं शेष भूमि पर कविन्द्रनाथ का कच्चा मकान स्थित पाया गया। जांच अधिकारियों ने यह भी दर्ज किया कि विवादित क्षेत्र ग्राम चन्द्रमेढ़ा और कटिंदा की सीमा पर स्थित है, जिससे सीमांकन संबंधी विवाद और अधिक जटिल हो गया है।

हाल ही में न्यायालय के निर्देश पर प्रस्तुत राजस्व निरीक्षक के बिंदुवार जांच प्रतिवेदन ने भी कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने रखी हैं। प्रतिवेदन में उल्लेख किया गया है कि खसरा नंबर 738 का नामांतरण बंदोबस्त त्रुटि सुधार के आधार पर किया गया था। वहीं जांच में यह भी दर्ज किया गया कि नवीन बंदोबस्त अभिलेखों में खसरा नंबर 738 का स्वतंत्र अस्तित्व स्पष्ट रूप से परिलक्षित नहीं होता है। जांच रिपोर्ट के अनुसार त्रुटि सुधार की प्रक्रिया में आवेदक की पुश्तैनी भूमि के नक्शे और रकबे में परिवर्तन हुआ, जिसके कारण वर्तमान विवाद उत्पन्न हुआ।

प्रतिवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि पट्टा प्राप्ति के समय संबंधित व्यक्ति शासकीय सेवा में कार्यरत थे। इसके अलावा जांच अधिकारियों ने यह भी इंगित किया कि त्रुटि सुधार की कार्रवाई से ग्रामों की सीमा और भौगोलिक क्षेत्रफल प्रभावित होने की स्थिति बनती दिखाई देती है। राजस्व नियमों के अनुसार ऐसे मामलों में उच्च स्तर की अनुमति और विधिवत प्रक्रिया आवश्यक होती है।

इधर, प्रकरण ने सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर भी हलचल पैदा कर दी है। कुछ लोगों द्वारा राजस्व निरीक्षक पर पक्षपातपूर्ण कार्यवाही के आरोप लगाए गए और विरोध प्रदर्शन की तैयारी की गई। हालांकि बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर राजस्व निरीक्षक का समर्थन किया है। ग्रामीणों का कहना है कि हाल ही में हुई जांच के दौरान दोनों गांवों के अभिलेखों, नक्शों और सीमाओं का मिलान कर निष्पक्ष जांच की गई थी तथा तथ्यों के आधार पर प्रतिवेदन तैयार किया गया।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि मामला पहले से न्यायालय में विचाराधीन है और अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय द्वारा ही किया जाना है। ऐसे में जांच अधिकारियों को बिना ठोस आधार के विवादों में घसीटना उचित नहीं है।

वर्तमान में पूरा मामला राजस्व न्यायालय और जिला प्रशासन के समक्ष लंबित है। पंचनामा, जांच प्रतिवेदन और उपलब्ध राजस्व अभिलेखों ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि खसरा नंबर 738 का निर्माण और नामांतरण पूरी तरह वैधानिक प्रक्रिया के तहत हुआ था या फिर बंदोबस्त त्रुटि सुधार के दौरान हुई किसी त्रुटि ने वर्षों पुराने इस विवाद को जन्म दिया।

फिलहाल क्षेत्रवासियों की निगाहें प्रशासन और न्यायालय की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में इस बहुचर्चित भूमि विवाद पर होने वाला फैसला न केवल दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि राजस्व अभिलेखों में दर्ज वास्तविक स्थिति क्या है और विवादित भूमि का वैधानिक स्वामित्व किसके पक्ष में सिद्ध होता है।

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