
बिलासपुर। किराएदार की बेदखली से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना किसी व्यक्ति को मकान मालिक साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए मकान मालिक और किरायेदार के बीच संबंध का प्रमाण होना अनिवार्य है।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब तक मकान मालिक और किरायेदार का संबंध स्थापित नहीं होता, तब तक बेदखली का आदेश नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने इसी आधार पर मकान मालिकों की याचिका खारिज कर दी।
क्या है मामला
तारबाहर क्षेत्र स्थित एक मकान को लेकर स्वर्णलता और शशि लता मार्कस ने किरायेदार गौतम पांडेय की बेदखली की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि मूल मालकिन रेचल मंटारो के निधन के बाद वे संपत्ति की वारिस और मकान मालिक हैं।
वहीं, किरायेदार गौतम पांडेय ने कोर्ट में कहा कि उनका इन महिलाओं से कभी मकान मालिक-किरायेदार का संबंध रहा ही नहीं और उन्होंने कभी इन्हें किराया नहीं दिया। जांच में यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ताओं के पास कोई रेंट एग्रीमेंट नहीं था, जिससे उनके दावे की पुष्टि हो सके।
कानून क्या कहता है
छत्तीसगढ़ किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत मकान मालिक की परिभाषा केवल संपत्ति के मालिक तक सीमित नहीं है। धारा 2(5) के अनुसार, जो व्यक्ति वर्तमान में किराया प्राप्त कर रहा है या जिसे कानूनी रूप से किराया लेने का अधिकार है, वही मकान मालिक माना जाएगा।
इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति ट्रस्टी, गार्जियन या किसी अन्य के हित में किराया वसूल रहा है, तो वह भी मकान मालिक की श्रेणी में आता है। खाली भूमि के मामले में भी जो व्यक्ति किराया पाने का अधिकार रखता है, उसे मकान मालिक माना जाता है।
अहम टिप्पणी
कोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि बेदखली के मामलों में केवल कागजी मालिकाना हक नहीं, बल्कि वास्तविक किरायेदारी संबंध का प्रमाण होना बेहद जरूरी है।
