

बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी (सीयू) में प्रशासनिक अव्यवस्था और विवाद लगातार बढ़ते जा रहे हैं। महिला की शिकायत और कर्मचारियों से जुड़े गंभीर मामलों में विश्वविद्यालय प्रशासन की सुस्ती सामने आई है। हालात यह हैं कि जांच के लिए बनाई गई फैक्ट फाइंडिंग कमेटी के संयोजक और सदस्यों को ही इसकी जानकारी नहीं है।
जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय प्रशासन ने 26 फरवरी को एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन किया था, लेकिन 19 दिन बीत जाने के बाद भी जांच शुरू नहीं हो सकी है। कारण यह है कि कमेटी के संयोजक और सदस्य ही इस गठन से अनभिज्ञ हैं।
एलडीसी राजन्नदर और जितेंद्र का मामला भी लंबित
कॉमर्स विभाग में पदस्थ एलडीसी राजन्नदर और लॉ विभाग के एलडीसी जितेंद्र कुमार से जुड़े मामले में भी 26 दिन बाद तक कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। विश्वविद्यालय ने 16 फरवरी को दोनों को शोकॉज नोटिस जारी किया था।
नोटिस के अनुसार, राजन्नदर को आवंटित टाइप-4 आवास में एक महिला के साथ रहने और 7 फरवरी को हुए विवाद के चलते कॉलोनी में हंगामा हुआ था, जिसमें सुरक्षा कर्मियों और पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। मामले में एफआईआर भी दर्ज है। महिला ने खुद को राजन्नदर की पत्नी बताया है। विवाद के बाद महिला को घर से निकालने की बात भी सामने आई है, लेकिन इसके बावजूद प्रशासन ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है।
वहीं, जितेंद्र कुमार पर आरोप है कि आवास आवंटित होने के बावजूद वे वहां नहीं रहे और एचआरए लेते रहे, साथ ही बिना अनुमति के अपने भाई के आवास में रह रहे थे। इस संबंध में भी उनसे जवाब मांगा गया है।
कमेटी के सदस्य बोले—हमें जानकारी ही नहीं
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी के संयोजक डॉ. मनीष श्रीवास्तव सहित अन्य सदस्य डॉ. भारती अहिरवार और डॉ. बुद्धेश्वर सिंगरौल ने स्पष्ट कहा कि उन्हें कमेटी गठन की कोई जानकारी नहीं है। इससे विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
प्रोजेक्टर चोरी मामला भी ठंडे बस्ते में
इधर, विश्वविद्यालय के कॉमर्स, मैनेजमेंट, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान समेत पांच विभागों से प्रोजेक्टर चोरी होने का मामला भी अब तक अनसुलझा है। करोड़ों रुपए खर्च कर सुरक्षा व्यवस्था होने के बावजूद चोरी हुई, लेकिन सुरक्षा अधिकारी ने पुलिस में एफआईआर तक दर्ज नहीं कराई।
सूत्रों के मुताबिक, राजन्नदर ने पत्र लिखकर चोरी में अपनी भूमिका स्वीकार भी की है, फिर भी न तो प्रोजेक्टर बरामद किए गए हैं और न ही कोई ठोस कार्रवाई की गई है।
लगातार सामने आ रहे मामलों और कार्रवाई में देरी से विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इन मामलों में कब तक ठोस कदम उठाता है।
