

शादी का झांसा देकर कथित रूप से किए जाने वाले दुष्कर्म मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया है। जस्टिस एन के व्यास ने शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने और रेप के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर लड़की बालिग है और उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बने हैं तो उसे रेप नहीं माना जा सकता।
इस तरह के मामलों की बाढ़ सी है। अक्सर ब्रेकअप के बाद शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप महिला पक्ष द्वारा लगाया जाता है। ऐसा कोई दिन नहीं है जहां इस तरह के मामले थाने तक नहीं आते । हाई कोर्ट ने लोअर कोर्ट की ओर से आरोपी युवक को दोषी ठहराने के आदेश को अवैध मानते हुए उसे निरस्त कर दिया और आरोपी को बरी कर दिया।
इस फैसले के साथ ही रेप के आरोपी युवक को करीब 20 साल बाद राहत मिली है। मामला सरगुजा जिले के धौरपुर थाना क्षेत्र का है। सरगुजा जिले की युवती साल 2000 में 12वीं कक्षा की छात्रा थी और किराए के मकान में रहकर पढ़ाई कर रही थी। दौरान लीना राम ध्रुव के साथ उसकी दोस्ती हुई और बाद में प्रेम संबंध बन गया। वह भी पढ़ाई कर रहा था। युवती का आरोप है कि युवक उसी के मकान में उसके साथ लिव इन मे रहने लगा। 8 दिसंबर 2000 को उसने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाएं। इसके बाद करीब 3 साल तक दोनों के बीच शारीरिक संबंध बनते रहे। पढ़ाई पूरी होने के बाद दोनों अपने-अपने गांव लौट गए
युवती के अनुसार दोनों के बीच तय हुआ था कि वे हर महीने की 15 और 31 तारीख को मिलेंगे। इसके बाद लड़की करीब एक सप्ताह तक युवक के घर रही, जहां उसने उसे पत्नी की तरह रखा । युवती ने आरोप लगाया कि लीनाराम ने शादी का झांसा देकर उससे 3 साल तक शारीरिक संबंध बनाएं ।16 मई 2003 को वह दोबारा युवक के घर गई और वहां रुकी। उसने शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन 11 जून 2003 को युवक उसे छोड़कर कहीं चला गया और वापस नहीं लौटा। युवती करीब 2 महीने तक उसके घर पर रही लेकिन युवक नहीं आया।
इसके बाद उसने लीनाराम ध्रुव के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज करा दिया।
ट्रायल सुनवाई के बाद अंबिकापुर के नायब मजिस्ट्रेट ने लीनाराम को दुष्कर्म का दोषी मानते हुए 7 साल की सजा और ₹5000 अर्थ दंड लगाया। इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा । सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि लोअर कोर्ट का दोष सिद्धि आदेश कानून का अनुरूप नहीं है इसलिए उसे निरस्त किया जाता है। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केवल शादी का बहाना बनाकर शारीरिक संबंध बनाना हर मामले में दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 26 वर्ष थी और उसे कथित शारीरिक संबंधों के परिणामों की पूरी जानकारी थी। ऐसे में यह संबंध पीड़िता की सहमति से बनाए गए माने जाएंगे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून की स्थापित स्थिति के अनुसार शादी का झांसा देकर बनाए गए संबंध हर परिस्थिति में दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आते। खासकर तब जब अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहता है कि आरोपी ने शुरू से ही केवल अपने शारीरिक इच्छा पूरी करते के उद्देश्य से संबंध बनाए थे, उसकी शादी करने का कोई इरादा नहीं था।
मामले में एफआईआर दर्ज करने के बाद पुलिस ने आरोपी को 27 अगस्त 2004 को गिरफ्तार किया था । 23 अगस्त 2005 को उसे सजा सुनाई थी । इसके बाद 23 जनवरी 2006 को आरोपी को जमानत मिल गई। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अब करीब 20 साल बाद हाईकोर्ट ने उसे दोष मुक्त कर दिया है। यह इस तरह के मामलों के लिए बड़ी नजीर होगी।
