

रायपुर/नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा चुनाव के लिए छह राज्यों की उम्मीदवार सूची जारी कर दी है। छत्तीसगढ़ से पार्टी ने लक्ष्मी वर्मा को अपना अधिकृत उम्मीदवार घोषित किया है।
पार्टी हाईकमान द्वारा जारी सूची में छत्तीसगढ़ के लिए लंबे मंथन के बाद लक्ष्मी वर्मा के नाम पर मुहर लगी। अंतिम पैनल में लक्ष्मी वर्मा के साथ नारायण चंदेल और डॉ. कृष्णमूर्ति बांधी का नाम शामिल था। संगठनात्मक अनुभव और राजनीतिक सक्रियता को देखते हुए अंततः लक्ष्मी वर्मा को टिकट दिया गया।
बताया जा रहा है कि पार्टी इस बार राज्यसभा में ‘मातृशक्ति’ को प्राथमिकता देने की रणनीति पर काम कर रही थी। संगठन में उनकी सक्रिय भूमिका और महिला वर्ग में मजबूत पकड़ को देखते हुए केंद्रीय नेतृत्व ने उनके नाम को हरी झंडी दी। लक्ष्मी वर्मा पिछले करीब 30 वर्षों से सक्रिय राजनीति में भूमिका निभा रही हैं।
वर्तमान राज्यसभा सदस्य
छत्तीसगढ़ से वर्तमान में राज्यसभा में पांच सदस्य प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इनमें से दो सदस्यों का कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रहा है।
फूलोदेवी नेताम (कांग्रेस) – कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 तक
केटीएस तुलसी (कांग्रेस) – कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 तक
राजीव शुक्ला (कांग्रेस) – कार्यकाल 29 जून 2028 तक
रंजीत रंजन (कांग्रेस) – कार्यकाल 29 जून 2028 तक
देवेन्द्र प्रताप सिंह (भाजपा) – कार्यकाल 2 अप्रैल 2030 तक
ऐसे होता है राज्यसभा चुनाव
राज्यसभा के सदस्य प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। यानी आम जनता नहीं, बल्कि संबंधित राज्य के विधायक मतदान करते हैं। राज्यसभा एक स्थायी सदन है, जिसके एक-तिहाई सदस्य हर दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं।
कुल 245 सदस्यीय राज्यसभा में 233 सदस्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से चुने जाते हैं, जबकि 12 सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करते हैं। किसी भी राज्य में जीत के लिए आवश्यक वोटों की संख्या वहां की विधानसभा के कुल विधायकों और रिक्त सीटों की संख्या के आधार पर निर्धारित की जाती है।
अन्य दावेदार भी थे मजबूत
लक्ष्मी वर्मा के अलावा नारायण चंदेल और डॉ. कृष्णमूर्ति बांधी को भी मजबूत दावेदार माना जा रहा था। शुरुआती पैनल में सरोज पांडेय सहित सात नाम शामिल थे, जिनमें से विचार-विमर्श के बाद तीन नाम शॉर्टलिस्ट किए गए। अंततः महिला प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता देते हुए पार्टी ने लक्ष्मी वर्मा पर भरोसा जताया।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा का यह फैसला संगठनात्मक संतुलन और सामाजिक समीकरण साधने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
