
यूनुस मेमन

रतनपुर। धार्मिक, ऐतिहासिक एवं पौराणिक नगरी रतनपुर में सदियों से आयोजित होने वाला प्रसिद्ध मेला इस वर्ष प्रशासनिक निर्णयों को लेकर विवादों में घिर गया है। नगर पालिका अध्यक्ष से लेकर राज्य और केंद्र—तीनों स्तरों पर भाजपा की सरकार होने के बावजूद रतनपुर के ऐतिहासिक मेले में आदिवासी विकास मेला आयोजित न किए जाने पर नगरवासियों ने गहरी नाराजगी व्यक्त की है।
रतनपुर मेले का इतिहास लगभग 500 वर्षों पुराना है। अट्ठाईस रानियों के सती होने की स्मृति में आठाबीसा तालाब के तट पर यह परम्परागत मेला सदियों से आयोजित होता आ रहा है, जो क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही लगभग 25–30 वर्ष पूर्व कोटा क्षेत्र के तत्कालीन विधायक स्व. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल के प्रयासों से मेले के समीप धान मंडी प्रांगण में सात दिवसीय आदिवासी विकास मेला प्रारंभ किया गया था।
इस विकास मेले के माध्यम से शासन की विभिन्न योजनाओं की प्रदर्शनी, विभागीय सहभागिता तथा आदिवासी बैनर से सुसज्जित मंच पर रात्रिकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे, जो मेलार्थियों और नगरवासियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहते थे। वर्षों में रतनपुर का मेला “आदिवासी विकास मेला” के नाम से भी पहचान बनाने लगा था।
इस वर्ष स्थानीय एवं जिला प्रशासन द्वारा आदिवासी विकास मेले को समाप्त कर केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक आयोजन सीमित कर दिया गया है। इसे लेकर नगरवासियों का कहना है कि इस निर्णय से मेले की गरिमा, रोचकता और उद्देश्य—तीनों प्रभावित होंगे। लोगों का आरोप है कि विकास मेले को हटाकर आयोजन को केवल मनोरंजन तक सीमित कर देना रतनपुर जैसे धार्मिक-ऐतिहासिक नगर के साथ अन्याय है।
नगरवासियों ने सवाल उठाया है कि जब केंद्र, राज्य और नगर—तीनों स्तरों पर “ट्रिपल इंजन की सरकार” है, तब भी यदि ऐतिहासिक और विकासोन्मुखी आयोजन सिमटते जा रहे हैं, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि आने वाले वर्षों में आदिवासी विकास मेले को पुनः प्रारंभ कर रतनपुर मेले की मूल पहचान और उद्देश्य को बनाए रखा जाए।
हालांकि प्रशासन की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि धान मंडी प्रांगण में सायंकालीन एवं रात्रिकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम पूर्ववत आयोजित किए जाएंगे।
