वसंत पंचमी से शुरू हुआ बैसवारी फाग महोत्सव, 45 दिनों तक गूंजेंगे पारंपरिक फाग गीत, अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति से जन्मी परंपरा आज समाज को जोड़ने का माध्यम बनी


बिलासपुर।
लोक-संस्कृति, सामाजिक एकता और परंपरा का प्रतीक मानी जाने वाली बैसवारी फाग परंपरा एक बार फिर पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ जीवंत हो उठी है। नवयुवक कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज द्वारा वसंत पंचमी से 45 दिवसीय बैसवारी फाग महोत्सव की शुरुआत की गई, जो शीतला अष्टमी 11 मार्च तक चलेगा। इस महोत्सव की खास बात यह है कि इसमें बुजुर्गों के साथ युवा और बच्चे भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, जिससे तीन पीढ़ियां एक साथ इस सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढ़ा रही हैं।
महोत्सव की शुरुआत वसंत पंचमी के अवसर पर हरदेव लाल मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ की गई। इस दौरान भगवान और देवी गीतों के साथ पारंपरिक बैसवारी फाग गीतों की प्रस्तुति दी गई। 45 दिनों तक चलने वाले इस आयोजन के तहत शहर के विभिन्न मोहल्लों और समाजजनों के घरों में लगातार फाग गायन होगा। व्यंकटेश मंदिर, गोंड़पाय, सदर बाजार सहित अन्य क्षेत्रों में होली तक घर-घर फाग गायन की परंपरा निभाई जाएगी।
फाग गायन में समाज के संरक्षक राम प्रसाद शुक्ला, अध्यक्ष अरविंद दीक्षित, सचिव राजेश शुक्ला सहित रमा शंकर मिश्रा, मनोज शुक्ला, देवी प्रसाद शुक्ला, स्वप्निल शुक्ला, प्रभात मिश्रा, आशीष शुक्ला, चन्द्र प्रकाश बाजपेयी, गोपाल मिश्र, कृष्ण मोहन पाण्डेय, मनोज तिवारी, शरद शुक्ला, अखिलेश शुक्ला ने अपनी सहभागिता निभाई। इस अवसर पर सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति चन्द्र भूषण बाजपेयी और पूर्व विधायक शैलेष पाण्डेय ने फाग पत्रिका का विमोचन किया।
तीन पीढ़ियां एक साथ निभा रहीं परंपरा
कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष अरविंद दीक्षित ने बताया कि बैसवारी फाग गायन की परंपरा उत्तर प्रदेश के बैसवाय अंचल के टौरी, टौरा, पारगांव, भैसही और पचड्डा गांवों से शुरू हुई थी। उत्तर प्रदेश से बिलासपुर आए समाजजनों ने वर्ष 1870 में इस परंपरा की नींव रखी, जो आज 156 वर्षों से लगातार चली आ रही है। उन्होंने कहा कि अब स्थिति यह है कि बुजुर्गों के साथ युवा और बच्चे भी पूरे उत्साह से फाग गायन और वादन में भाग ले रहे हैं, जिससे यह परंपरा नई पीढ़ी तक मजबूती से पहुंच रही है।
अंग्रेजी शासन के खिलाफ रणनीति से जुड़ा इतिहास
समिति के उपाध्यक्ष कृष्ण मोहन पाण्डेय ने बताया कि वर्ष 1870 में अंग्रेजी शासन के दौरान समाज को संगठित करने और रणनीति बनाने के उद्देश्य से फाग गायन की शुरुआत की गई थी। उस समय बिलासपुर छोटा कस्बा था और सदर बाजार, खपरगंज, गोंड़पारा, मसानगंज और चाटापारा क्षेत्रों में समाज के लोग बड़ी संख्या में रहते थे। वसंत पंचमी से होली तक प्रतिदिन फाग गायन होता था, जो समाज की एकता का मजबूत आधार बना। आज यही परंपरा वसंत पंचमी से शुरू होकर होली के बाद शीतला अष्टमी तक निभाई जा रही है।
शीतला अष्टमी पर होगा पारंपरिक समापन
महोत्सव का समापन शीतला अष्टमी के दिन हरदेव लाल मंदिर में किया जाएगा। इस अवसर पर समाज के लोग अपने-अपने घरों से कंडे लाकर होलिका दहन करेंगे। इस परंपरा के माध्यम से समाज की सुख-समृद्धि और एकता की कामना की जाती है।

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