

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि पत्नी द्वारा दर्ज कराए गए आपराधिक मामले में पति के बरी होने के बाद दोनों पति-पत्नी लंबे समय तक फिर से साथ रह चुके हों, तो पुराने आरोपों के आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता। लंबे समय तक साथ रहने को आरोपों की माफी माना जाएगा और बाद में इन्हीं तथ्यों के आधार पर तलाक की मांग नहीं की जा सकती।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच ने जांजगीर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पति को तलाक दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में क्रूरता या अवैध संबंध जैसे आरोप, यदि लंबे सहवास के बाद उठाए जाएं, तो वे कानूनन टिकाऊ नहीं होते।
मामले में बलौदा बाजार और जांजगीर में रहने वाले दंपती की शादी 2 जून 2003 को हुई थी। शादी के करीब पांच साल बाद वर्ष 2008 में पत्नी ने पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए आईपीसी की धारा 498-ए के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी। इस मामले में वर्ष 2009 में कोर्ट ने पति को बरी कर दिया था।
इसके बाद वर्ष 2010 में पति की शिक्षक पद पर नियुक्ति हुई और दोनों पति-पत्नी वर्ष 2010 से 17 दिसंबर 2017 तक एक साथ रहते रहे। बाद में पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर पत्नी पर शारीरिक और मानसिक क्रूरता करने तथा विवाह के बाद किसी अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध रखने का आरोप लगाया। फैमिली कोर्ट ने इन आधारों पर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i) और 13(1)(ia) के तहत तलाक मंजूर कर दिया था।
फैमिली कोर्ट के इस फैसले को पत्नी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। पत्नी की ओर से तर्क दिया गया कि पति ने अवैध संबंध का आरोप वर्ष 2017 का बताते हुए वर्ष 2023 में याचिका में संशोधन के जरिए जोड़ा, जो अत्यधिक देरी है। हाईकोर्ट ने इसे करीब 5.5 साल की अनुचित देरी माना और कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(1)(d) के तहत बिना उचित कारण के देरी तलाक के आधार को कमजोर करती है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पति ने न केवल पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर को माफ किया, बल्कि उसके बाद 7 साल तक साथ रहकर वैवाहिक जीवन भी निभाया। ऐसे में पुराने विवाद, कथित क्रूरता या आरोपों को माफ किया हुआ माना जाएगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का तलाक मंजूर करने वाला आदेश रद्द कर दिया।
