

बिलासपुर। अपोलो अस्पताल में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति पाने के आरोपी चिकित्सक डॉ. नरेंद्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेंद्र जॉन केम के मामले में पुलिस विवेचना ने कई गंभीर सवाल खड़े किए। जांच के दौरान सरकंडा पुलिस ने अस्पताल प्रबंधन से बार-बार दस्तावेज मांगे, रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराने पर साक्ष्य छिपाने तक की चेतावनी दी, लेकिन आगे की विवेचना और विधिक राय के बाद अस्पताल प्रबंधन तथा चयन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक संलिप्तता के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर न्यायालय में क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई। वहीं आरोपी चिकित्सक के विरुद्ध धोखाधड़ी, कूटरचना और अवैध रूप से चिकित्सकीय कार्य करने के आरोपों में अभियोजन जारी है।

मामले की शुरुआत 9 अप्रैल 2025 को हुई, जब पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय पं. राजेंद्र प्रसाद शुक्ला के पुत्र डॉ. प्रदीप शुक्ला ने सरकंडा थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि वर्ष 2006 में अपोलो अस्पताल में उनके पिता का हृदय उपचार डॉ. नरेंद्र विक्रमादित्य यादव ने किया था, जबकि वह विधिवत कार्डियोलॉजिस्ट नहीं थे और अस्पताल ने पर्याप्त सत्यापन किए बिना उन्हें नियुक्त कर दिया था।
जांच में सामने आए गंभीर तथ्य
विवेचना के दौरान पुलिस ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल, उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज, दमोह पुलिस, अपोलो अस्पताल तथा अन्य संस्थाओं से जानकारी जुटाई। जांच में सामने आया कि आरोपी ने स्वयं को एमबीबीएस, एमआरसीपी और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में फेलोशिप धारक बताया था। हालांकि मेडिकल काउंसिल से उसके दावों की पुष्टि नहीं हो सकी। उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज से भी उसके नाम पर वैध एमबीबीएस डिग्री का रिकॉर्ड जांच में उपलब्ध नहीं मिला। दमोह में दर्ज प्रकरण में यह भी सामने आया कि उसने कथित रूप से “नरेंद्र जॉन केम” नाम से आधार, पैन और अन्य दस्तावेज तैयार कराए थे।
पुलिस ने आरोपी को प्रोडक्शन वारंट पर बिलासपुर लाकर पूछताछ की। पूछताछ में उसने अपोलो अस्पताल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्य करने और अनेक एंजियोग्राफी एवं एंजियोप्लास्टी करने की बात स्वीकार की, लेकिन अपनी योग्यता संबंधी दस्तावेजों का संतोषजनक प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका।
297 मरीजों का इलाज, 27 मौतों का उल्लेख
जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि आरोपी ने अपने कार्यकाल में लगभग 297 मरीजों का उपचार किया था। पुलिस रिकॉर्ड में लगभग 27 मरीजों की मृत्यु का उल्लेख है, हालांकि विवेचना में इन सभी मामलों के समर्थन में प्रमाणित शिकायतें या पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं मिले। केवल दो पीड़ित पक्षों ने औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।
पुलिस ने सात पत्र भेजे, रिकॉर्ड मांगे
जांच के दौरान 9 अप्रैल से 19 मई 2025 के बीच सरकंडा पुलिस ने अपोलो अस्पताल प्रबंधन को सात पत्र भेजकर नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज, डिग्रियां, मेडिकल काउंसिल पंजीयन, चयन प्रक्रिया, चयन समिति के रिकॉर्ड, मरीजों से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक डेटा और तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारियों की जानकारी मांगी।
23 मई 2025 को जारी नोटिस में पुलिस ने कहा कि बार-बार पत्र भेजने के बावजूद कई महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। नोटिस में यह भी उल्लेख किया गया कि जिन दस्तावेजों से अस्पताल प्रबंधन पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, वे तत्काल उपलब्ध करा दिए गए, जबकि जांच के लिए महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए गए। पुलिस ने चेतावनी दी कि यदि रिकॉर्ड बिलासपुर में उपलब्ध नहीं हैं तो चेन्नई स्थित कॉर्पोरेट कार्यालय से मंगाकर तीन दिन के भीतर उपलब्ध कराए जाएं, अन्यथा साक्ष्य छिपाने या नष्ट करने के संबंध में कानूनी कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।
अपोलो का जवाब
29 मई 2025 को अस्पताल के यूनिट हेड ने पांच पृष्ठों का विस्तृत जवाब भेजा। अस्पताल ने कहा कि उसने जांच में कोई जानकारी नहीं छिपाई और उपलब्ध सभी दस्तावेज पुलिस को सौंप दिए हैं। प्रबंधन के अनुसार मामला लगभग 19 वर्ष पुराना होने के कारण कई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं, कई कर्मचारी संस्था छोड़ चुके हैं और उस समय अधिकांश दस्तावेज हार्ड कॉपी में रखे जाते थे, जो निर्धारित रिकॉर्ड संरक्षण अवधि पूरी होने के बाद उपलब्ध नहीं रहे।
अस्पताल ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष 2006-07 में वरिष्ठ चिकित्सकों की नियुक्ति के लिए अलग चयन समिति का गठन नहीं होता था। नियुक्तियां यूनिट हेड, मुख्य कार्यकारी अधिकारी अथवा चेन्नई स्थित कॉर्पोरेट प्रबंधन के स्तर पर की जाती थीं।
आगे की विवेचना में बदला निष्कर्ष
आरोपी चिकित्सक के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल होने के बाद पुलिस ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(8) के तहत अस्पताल प्रबंधन और चयन प्रक्रिया की भूमिका की अलग से जांच जारी रखी। इस दौरान अतिरिक्त पत्राचार, उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण और संबंधित अधिकारियों के बयान लिए गए।
जांच पूरी होने पर वरिष्ठ अधिकारियों और जिला अभियोजन अधिकारी से प्राप्त विधिक राय में कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह सिद्ध नहीं होता कि अपोलो अस्पताल प्रबंधन या संबंधित अधिकारियों ने जानबूझकर, दुर्भावनापूर्ण तरीके से अथवा आपराधिक षड्यंत्र के तहत आरोपी की नियुक्ति की थी। इसी आधार पर पुलिस ने अस्पताल प्रबंधन एवं डॉ. बी.आर. प्रेम कुमार के विरुद्ध साक्ष्य के अभाव में न्यायालय के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी।
हालांकि आरोपी डॉ. नरेंद्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेंद्र जॉन केम के विरुद्ध धोखाधड़ी, कूटरचना, फर्जी दस्तावेजों के उपयोग और अवैध रूप से चिकित्सकीय कार्य करने के आरोपों में आपराधिक कार्यवाही पूर्ववत जारी है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि एक ओर विवेचना के दौरान पुलिस ने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराने को लेकर अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठाए थे, वहीं अंतिम जांच और विधिक राय के आधार पर प्रबंधन की आपराधिक संलिप्तता सिद्ध नहीं होने से उसे राहत मिल गई। अब अंतिम निर्णय न्यायालय में लंबित आपराधिक कार्यवाही और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर होगा।
