*दुर्लभ आध्यात्मिक संयोग: ज्येष्ठ मास में पुरुषोत्तम मास और कमला एकादशी का महासंगम

सनातन धर्म संस्कृति में इस वर्ष एक अत्यंत दुर्लभ और कल्याणकारी ज्योतिषीय संयोग बन रहा है। इस वर्ष सूर्य संक्रांति न होने के कारण ‘ज्येष्ठ मास’ को अधिक मास (मलमास या पुरुषोत्तम मास) का दर्जा मिला है, जो कि 17 मई से प्रारंभ होकर 15 जून 2026 तक चलेगा। इस पावन पुरुषोत्तम मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली ‘कमला एकादशी’ (जिसे पद्मिनी एकादशी भी कहा जाता है) आगामी 27 मई 2026, दिन बुधवार को मनाई जाएगी।
पीतांबरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉक्टर दिनेश जी महाराज ने बताया कि ज्येष्ठ का महीना साक्षात अग्नि तत्व और सूर्य के प्रभाव का महीना है, जबकि पुरुषोत्तम मास भगवान श्री हरि विष्णु की कृपा का साक्षात स्वरूप है। जब ये दोनों ऊर्जाएं एक साथ मिलती हैं, तो ब्रह्मांड में आध्यात्मिक तरंगों का प्रवाह अत्यंत तीव्र हो जाता है। ऐसी स्थिति में कमला एकादशी का व्रत रखना न केवल पिछले जन्मों के पापों का शमन करता है, बल्कि साधक को घोर दरिद्रता से मुक्ति दिलाकर जीवन में अक्षय धन-वैभव और मानसिक शांति प्रदान करता है।
कमला एकादशी के दिन व्रती को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र स्नान करना चाहिए और भगवान पुरुषोत्तम के साथ माता लक्ष्मी की संयुक्त पूजा करनी चाहिए। इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ और दीपदान करने का विशेष महत्व है। पुरुषोत्तम मास में मांगलिक कार्य जैसे विवाह या गृह प्रवेश वर्जित होते हैं, परंतु साधना, मंत्र दीक्षा, भागवत कथा का श्रवण और निर्धनों को अन्न-वस्त्र का दान करना अनंत गुना फलदायी माना गया है।

ज्येष्ठ पुरुषोत्तम मास एवं कमला एकादशी का आध्यात्मिक महत्व:
भारतीय वैदिक काल गणना अत्यंत वैज्ञानिक और सूक्ष्म सिद्धांतों पर आधारित है। सूर्य वर्ष (सौर मास) और चंद्र वर्ष (चंद्र मास) के बीच प्रतिवर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर आता है। तीन वर्षों में यह अंतर बढ़कर लगभग एक पूरे महीने (29 से 30 दिन) के बराबर हो जाता है। इसी काल-अंतर को संतुलित करने और ऋतुओं के साथ पंचांग का सामंजस्य बिठाने के लिए हर तीसरे वर्ष पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे ‘अधिक मास’ या ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाता है।

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब इस अतिरिक्त मास को कोई स्वामी नहीं मिला और इसे ‘मलमास’ (अपवित्र महीना) कहकर शुभ कार्यों के लिए अयोग्य मान लिया गया, तब इस महीने ने भगवान विष्णु की शरण ली। करुणासागर भगवान श्रीहरि ने इसे अपना सर्वश्रेष्ठ नाम ‘पुरुषोत्तम’ प्रदान किया और वरदान दिया कि जो भी मनुष्य इस महीने में मेरी भक्ति, व्रत और सत्कर्म करेगा, उसे पूरे वर्ष की पूजा से भी अधिक फल प्राप्त होगा।

कमला (पद्मिनी) एकादशी: स्वरूप और महिमा
सामान्यतः एक वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं, परंतु जिस वर्ष अधिक मास आता है, उस वर्ष इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। पुरुषोत्तम मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘कमला एकादशी’ अथवा ‘पद्मिनी एकादशी’ के नाम से जाना जाता है।
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ‘कमला’ माता लक्ष्मी का ही एक नाम है। यह एकादशी भगवान विष्णु और महालक्ष्मी की संयुक्त कृपा प्राप्त करने की सर्वश्रेष्ठ तिथि है। पद्मपुराण के अनुसार, यह व्रत समस्त सिद्धियों को देने वाला और ऐश्वर्य प्रदायक है।

व्रत का आध्यात्मिक प्रभाव: मान्यता है कि कमला एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है और वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

भौतिक दुखों का निवारण: यह व्रत व्यक्ति के जीवन से अज्ञात पापों, मानसिक तनाव और आर्थिक संकटों को समूल नष्ट कर देता है। यदि कोई साधक निष्काम भाव से यह व्रत करता है, तो उसके पूर्व जन्मों के संचित बुरे कर्मों का प्रभाव भी क्षीण हो जाता है।

ज्येष्ठ मास में पुरुषोत्तम मास पड़ने का विशेष प्रभाव
इस वर्ष पुरुषोत्तम मास का आगमन ‘ज्येष्ठ मास’ में हुआ है, जिसे ज्योतिषीय और आध्यात्मिक दृष्टि से एक असाधारण घटना माना जा रहा है। ज्येष्ठ मास में अधिक मास पड़ने के प्रभाव को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
1. सूर्य और विष्णु ऊर्जा का महासंगम
ज्येष्ठ मास का स्वामी मंगल को माना जाता है और इस महीने में सूर्य देव अपने पूर्ण प्रखर स्वरूप (तपिश) में होते हैं। सूर्य को जगत की आत्मा और भगवान विष्णु का ही एक रूप (सूर्यनारायण) माना गया है। जब ज्येष्ठ मास में विष्णु-स्वरूप पुरुषोत्तम मास आता है, तो यह ‘अग्नि’ और ‘भक्ति’ का अद्भुत मेल बनता है। यह समय आंतरिक विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) को तपस्या की अग्नि में भस्म करने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
2. प्रकृति और जल का महत्व
ज्येष्ठ के महीने में भीषण गर्मी होती है, जिससे जल के स्रोतों का महत्व बढ़ जाता है। इस महीने में पड़ने वाले पुरुषोत्तम मास के दौरान भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए राहगीरों को शीतल जल पिलाना, प्याऊ लगवाना और जल से भरे घड़े का दान करना (घट दान) सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह पर्यावरण और जीव-जगत के प्रति हमारे उत्तरदायित्व को भी रेखांकित करता है।
3. आत्म-अवलोकन और आध्यात्मिक विश्राम
ज्येष्ठ अधिक मास के दौरान आकाश मंडल में कोई सूर्य संक्रांति (सूर्य का राशि परिवर्तन) नहीं होती। इस कारण इस समय को ब्रह्मांड का एक ‘आध्यात्मिक विराम’ माना जाता है। बाहरी भौतिक और मांगलिक कार्य थम जाते हैं, जिससे मनुष्य को अपने अंतर्मन में झांकने का अवसर मिलता है। ज्येष्ठ की तपिश मनुष्य को धैर्य सिखाती है और पुरुषोत्तम मास की भक्ति उसे मानसिक शीतलता प्रदान करती है।

कमला एकादशी की व्रत विधि एवं अनुष्ठान
कमला एकादशी का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में एक विशिष्ट पूजा पद्धति का उल्लेख किया गया है व्रत के नियम दशमी तिथि की संध्या से ही आरंभ हो जाते हैं। इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और कांसे के बर्तनों के प्रयोग तथा नमक से बचना चाहिए। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी, सरोवर या घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए। इसके पश्चात हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।पूजा घर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। उन्हें पीले पुष्प, पीला चंदन, धूप, दीप और तुलसी दल अर्पित करें। इस दिन ऋतु फल (विशेषकर ज्येष्ठ मास के फल जैसे आम, खरबूजा) का भोग लगाना चाहिए।पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का कम से कम 108 बार या 11 माला जाप करें। विष्णु सहस्रनाम, श्री सूक्त या पुरुष सूक्त का पाठ करना अत्यंत लाभकारी होता है।एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए, बल्कि भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करना चाहिए। द्वादशी तिथि को सुबह ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराकर और दान-दक्षिणा देकर ही व्रत का पारण (व्रत खोलना) करना चाहिए।


ज्येष्ठ मास में पड़ने वाला पुरुषोत्तम मास और उसमें आने वाली कमला एकादशी मानव जाति के लिए प्रकृति और ईश्वर का एक अनमोल उपहार है। ज्येष्ठ मास की तपस्या जहां हमारी सहनशीलता और संकल्प शक्ति को सुदृढ़ करती है, वहीं कमला एकादशी हमारे जीवन के भौतिक दुखों और दरिद्रता का हरण कर हमें मानसिक व आध्यात्मिक शांति की ओर ले जाती है। यह तीन वर्ष में मिलने वाला एक ऐसा ‘सशक्त अवसर’ है, जिसमें हम अपने सांसारिक कर्तव्यों को निभाते हुए भी परम तत्व (वैकुंठ) की प्राप्ति का मार्ग सुगम कर सकते हैं। अतः इस पवित्र कालखंड का उपयोग केवल उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि और परोपकार के रूप में किया जाना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!