

कोलकाता/रायपुर। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे घोषित होने के बाद राजनीतिक विश्लेषण का केंद्र पश्चिम बंगाल बन गया है। यहां सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी की चुनावी रणनीति और उसके क्रियान्वयन को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी को इस सफलता के प्रमुख कारकों में गिना जा रहा है।

चुनाव के दौरान पार्टी ने पारंपरिक प्रचार पद्धतियों के साथ-साथ अत्यंत सूक्ष्म स्तर की रणनीति अपनाई। इसमें स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले उन नेताओं को भी जोड़ा गया, जो पूर्व में चुनाव हार चुके थे, किंतु अपने-अपने क्षेत्रों में उनका जनाधार कायम था। इन नेताओं के माध्यम से मतदाताओं के विशिष्ट वर्गों तक पहुंच बनाने का प्रयास किया गया। कोलकाता, हावड़ा, हुगली और नादिया जैसे क्षेत्रों में इस प्रकार का नेटवर्क विकसित किया गया।

चुनावी प्रबंधन में ‘माइक्रो मैनेजमेंट’ को विशेष महत्व दिया गया। इसके तहत समाज के विविध वर्गों—व्यापारियों, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स, चिकित्सकों, शिक्षाविदों, कलाकारों, सांस्कृतिक समूहों, बंदरगाह कर्मियों, ठेला-रिक्शा चालकों और मछली विक्रेताओं—तक अलग-अलग रणनीतियों के जरिए पहुंच बनाई गई। प्रत्येक वर्ग के लिए अलग संवाद शैली और संपर्क तंत्र विकसित कर समर्थन जुटाने का प्रयास किया गया।

चुनाव के दौरान छत्तीसगढ़ के नेताओं को क्लस्टर आधारित जिम्मेदारियां भी सौंपी गईं। दुर्गापुर जिले के अंतर्गत बर्धमान और दुर्गापुर लोकसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी पूर्व मंत्री राजेश मूणत और वरिष्ठ नेता शिवरतन शर्मा को दी गई। इन क्षेत्रों की सात-सात विधानसभा सीटों पर संगठनात्मक गतिविधियों के समन्वय का दायित्व उन्हें सौंपा गया, जबकि सहयोग और समन्वय की जिम्मेदारी क्रेडा के अध्यक्ष भूपेन्द्र सवन्नी को दी गई। दक्षिण बर्धमान सीट पर विशेष ध्यान केंद्रित करने के निर्देश भी जारी किए गए थे।
इसी क्रम में, संगठन महामंत्री पवन साय को 56 विधानसभा सीटों पर बूथ मैनेजमेंट और संगठन विस्तार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। उनका कार्य केवल निगरानी तक सीमित नहीं था, बल्कि जमीनी स्तर पर संगठन को सक्रिय बनाए रखना, कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल स्थापित करना और प्रत्येक बूथ तक प्रभावी नेटवर्क तैयार करना शामिल था।

कोलकाता क्लस्टर में एक अलग माइक्रो मैनेजमेंट टीम गठित की गई, जिसमें छत्तीसगढ़ के नेताओं को शामिल कर उन्हें विभिन्न पेशेवर समूहों तक सीधे पहुंचने का दायित्व दिया गया। इस टीम का नेतृत्व प्रदेश महामंत्री संजय श्रीवास्तव और सौरभ सिंह के हाथों में था, जिन्होंने योजनाबद्ध तरीके से सामाजिक समूहों के बीच संपर्क अभियान चलाया।
चुनावी प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रैलियों और सभाओं के आयोजन में भी छत्तीसगढ़ के नेताओं को अहम जिम्मेदारी सौंपी गई। डिप्टी सीएम विजय शर्मा, मंत्री केदार कश्यप, गजेन्द्र यादव और टंकराम वर्मा को रैली स्थलों की तैयारियों, स्थानीय समन्वय और कार्यक्रम प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई थी।
इसके अतिरिक्त नीलू शर्मा, अनुराग सिंहदेव, हरपाल सिंह भाम्भरा और विश्व विजय सिंह तोमर को विभिन्न जिलों में कैम्पेनिंग और बूथ मैनेजमेंट से जुड़े कार्यों में लगाया गया। इन सभी को माइक्रो स्तर पर योजना बनाकर उसे लागू करने के निर्देश दिए गए थे।

बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने भी पश्चिम बंगाल में जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई। उनके जैसे युवा चेहरों ने जमीनी स्तर पर काम करते हुए न सिर्फ स्थानीय हालात को समझा बल्कि एक-एक मतदाता से संपर्क कर उनमें यह विश्वास जगाया कि इस बार पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनेगी। तभी लोग निर्भय होकर वोट देने मतदान केंद्र तक पहुंचे।
कोलकाता क्लस्टर में बेहद दिलचस्प प्रयोग किए गए । छत्तीसगढ़ के नेताओं को कोलकाता में किसी गुमनाम चेहरे की तरह मैदान में उतारा गया। सबको एक अलग-अलग वर्ग तक पहुंचने का टास्क दिया गया । बिलासपुर के अनमोल झा को स्थानीय कॉरपोरेशन की जिम्मेदारी दी गई। स्थानीय स्तर पर इसका विशेष महत्व था, जिसके जरिए अनमोल झा मतदाताओं के बड़े वर्ग से संपर्क बना पाए और उन्होंने वहां अपना प्रभाव छोड़ा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी की चुनावी पद्धति में संगठनात्मक ढांचा केंद्रीय भूमिका निभाता है, जहां चुनाव केवल उम्मीदवारों के भरोसे नहीं, बल्कि व्यापक संगठनात्मक तंत्र के माध्यम से लड़ा जाता है। विभिन्न राज्यों के नेताओं को अलग-अलग क्षेत्रों में जिम्मेदारी देकर पार्टी इस मॉडल को लागू करती रही है।
इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि पार्टी नेतृत्व स्तर पर छत्तीसगढ़ के नेताओं की कार्यशैली और क्षमता का पूर्व अनुभव मौजूद रहा है, जिसके आधार पर उन्हें पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्य में व्यापक जिम्मेदारियां सौंपी गईं। हालांकि, इस विषय पर पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक वक्तव्य जारी नहीं किया गया है, लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी सक्रियता और भूमिका को चुनावी प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव के साथ जहां एक ओर ममता बनर्जी की पराजय चर्चा में है, वहीं दूसरी ओर चुनाव परिणामों के बावजूद उनके द्वारा इस्तीफा न देने के निर्णय ने भी नई राजनीतिक बहस को जन्म दिया है। इस पूरे परिदृश्य में चुनावी रणनीति, विशेषकर छत्तीसगढ़ कैडर की भूमिका, विश्लेषण का प्रमुख विषय बनकर उभरी है।
