

न्यायधानी के सरकण्डा स्थित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में चैत्र वासंतिक नवरात्र के पावन अवसर पर आयोजित श्रीमद् देवी भागवत महापुराण कथा ज्ञानयज्ञ अपने चरमोत्कर्ष की ओर अग्रसर है। पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज के संरक्षण एवं आचार्य श्री मुरारीलाल त्रिपाठी ‘राजपुरोहित’ की ओजस्वी वाणी में प्रवाहित हो रही यह कथा भक्तों के लिए आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बनी हुई है।कथा के पांचवें सोपान में प्रवेश करते हुए आचार्य श्री मुरारीलाल त्रिपाठी जी ने माँ स्कंदमाता के स्वरूप का वंदन किया। पांचवें दिन की कथा मुख्य रूप से ‘अधर्म पर धर्म की विजय’ और ‘नारी शक्ति के वैश्विक उदय’ पर केंद्रित रही।
महिषासुर का आतंक और देवताओं की करुण पुकार आचार्य श्री ने बताया कि जब असुर महिषासुर ने वरदान पाकर तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया और इंद्र सहित सभी देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया, तब समस्त देवता त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की शरण में पहुँचे। महिषासुर का अहंकार इतना बढ़ गया था कि वह स्वयं को ही परमेश्वर मानने लगा था। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब शक्ति के साथ विवेक का अंत हो जाता है, तब विनाश सुनिश्चित है।
दिव्य तेज से महाशक्ति का प्राकट्य
कथा का सबसे भावुक और ऊर्जावान क्षण वह था जब देवताओं के सामूहिक तेज से एक दिव्य पुंज प्रकट हुआ। आचार्य श्री ने सविस्तार वर्णन किया कि कैसे:
भगवान शिव के तेज से मुख,विष्णु के तेज से भुजाएँ,ब्रह्मा के तेज से चरण,और अन्य देवताओं के अंश से माँ भगवती के विभिन्न अंगों की रचना हुई।

सभी देवताओं ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र (शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, इंद्र ने वज्र) माँ को समर्पित किए। इस प्रकार ‘महिषासुर मर्दिनी’ का प्राकट्य हुआ, जो इस ब्रह्मांड की सामूहिक चेतना और एकता का प्रतीक है।
माँ स्कंदमाता: वात्सल्य और वीरता का संगम
नवरात्र के पांचवें दिन माँ स्कंदमाता की महिमा बताते हुए महाराज जी ने कहा कि स्कंदमाता ‘कार्तिकेय’ (स्कंद) की माता हैं। यह स्वरूप सिखाता है कि एक स्त्री एक ओर जहाँ ममतामयी माँ है, वहीं आवश्यकता पड़ने पर वह धर्म की रक्षा के लिए रणचंडी भी बन सकती है। स्कंदमाता की उपासना से भक्तों को मोक्ष के द्वार खुलते हैं और साधक को परम शांति का अनुभव होता है।

शक्ति पूजा और सामाजिक समरसता
आचार्य श्री ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देवी भागवत की प्रासंगिकता पर बल देते हुए कहा कि आज समाज में व्याप्त बुराइयों, व्यसनों और कुरीतियों रूपी महिषासुर का अंत करने के लिए हमें सामूहिक शक्ति (शक्ति पूजा) की आवश्यकता है। उन्होंने नारी शक्ति के सम्मान को ही राष्ट्र की उन्नति का मूल मंत्र बताया।
पीठाधीश्वर का संदेश
पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने प्रवचन के अंत में आशीर्वाद देते हुए कहा कि “देवी भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। नर-नारायण के प्रसंग से हमने इंद्रियों को जीतना सीखा, और महिषासुर वध के प्रसंग से हम यह सीख रहे हैं कि बुराई चाहे कितनी भी बलशाली क्यों न हो, सत्य और दिव्य शक्ति के सामने उसे झुकना ही पड़ता है।”
भक्तों का जनसैलाब और महाआरती
श्रीमद् देवी भागवत कथा के पांचवें दिन मंदिर परिसर भक्तों से खचाखच भरा रहा। ‘जय माता दी’ और ‘आद्या शक्ति’ के जयकारों से पूरा सरकण्डा क्षेत्र गुंजायमान रहा। कथा के विश्राम पर आयोजित महाआरती में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। आगामी दिनों में माँ कात्यायनी, कालरात्रि और महागौरी के प्रसंगों के साथ कन्या पूजन और पूर्णाहुति का भव्य आयोजन किया जाएगा।
मंदिर प्रबंधन ने सभी श्रद्धालुओं से विनम्र अपील की है कि वे अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस अमृतमयी कथा का लाभ उठाएं और जीवन को कृतार्थ करें।
