

न्यायधानी के सरकण्डा स्थित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में आयोजित श्रीमद् देवी भागवत महापुराण कथा ज्ञानयज्ञ अपने चतुर्थ दिवस (चौथे सोपान) में प्रवेश कर चुका है। चैत्र वासंतिक नवरात्र के इस पावन पर्व पर मंदिर परिसर दिव्य मंत्रों और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत है। पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज के सानिध्य और आचार्य श्री मुरारीलाल त्रिपाठी ‘राजपुरोहित’ की ओजस्वी वाणी में कथा का प्रवाह निरंतर भक्तों को रसपान करा रहा है।
चौथे दिन की कथा मुख्य रूप से ‘तप, त्याग और अहंकार के दमन’ पर केंद्रित रही।

इस सोपान के प्रमुख आकर्षण और आध्यात्मिक संदेश निम्नलिखित रहे:
नर-नारायण की तपस्या और इंद्र का गर्व भंग
कथा व्यास ने चतुर्थ दिवस के प्रसंग का प्रारंभ बदरिकाश्रम (बद्रीनाथ) में भगवान विष्णु के अंशावतार नर और नारायण की कठोर तपस्या से किया। आचार्य श्री ने बताया कि तपस्या का उद्देश्य केवल स्वयं की सिद्धि नहीं, बल्कि लोक कल्याण और धर्म की रक्षा होता है। जब नर-नारायण की घोर तपस्या से इंद्र का सिंहासन डोलने लगा, तो इंद्र ने कामदेव और अप्सराओं को उनकी तपस्या भंग करने भेजा।

उर्वशी का प्राकट्य: सौंदर्य और भक्ति का अनूठा संगम
इस दिन की कथा का सबसे रोमांचक क्षण उर्वशी की उत्पत्ति का वर्णन था। जब कामदेव और अप्सराओं ने नर-नारायण को विचलित करने का प्रयास किया, तब भगवान नारायण ने मुस्कुराते हुए अपनी जंघा (ऊरु) को थपथपाया। उस स्पर्श मात्र से एक ऐसी दिव्य सुंदरी प्रकट हुई, जिसका सौंदर्य इंद्र की सभी अप्सराओं से कहीं अधिक था।
आध्यात्मिक संदेश: भगवान ने सिद्ध किया कि जो तपस्वी आद्याशक्ति का भक्त है, उसे सांसारिक प्रलोभन विचलित नहीं कर सकते। उर्वशी का प्राकट्य अहंकार को नष्ट करने और शक्ति की महिमा को स्थापित करने का प्रतीक है।
माँ कूष्माण्डा का पूजन और ब्रह्मांड की रचना
चैत्र नवरात्र के चौथे दिन मुख देवी का विशेष पूजन माँ कूष्माण्डा के स्वरूप का पूजन किया गया। अपनी मंद मुस्कान से ‘अण्ड’ अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली आदि शक्ति का वर्णन करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि जब चारों ओर अंधकार था, तब इन्हीं देवी ने अपनी ऊष्मा से सृष्टि की रचना की। भक्तों को बताया गया कि माँ कूष्माण्डा की भक्ति से बुद्धि, यश और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
हयग्रीव अवतार और वेदों की रक्षा
चतुर्थ सोपान में भगवान के हयग्रीव अवतार की कथा का भी सविस्तार वर्णन किया गया। कैसे तामसी शक्तियों (मधु-कैटभ) ने वेदों को चुरा लिया था और देवी की कृपा से भगवान ने हयग्रीव रूप धारण कर वेदों की पुनर्स्थापना की। यह प्रसंग हमें ज्ञान और विवेक के संरक्षण की प्रेरणा देता है।
कथा के अंत में पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने कहा कि “देवी भागवत का चौथा दिन हमें सिखाता है कि सफलता और शक्ति मिलने पर कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। नर-नारायण की तपस्या हमें इंद्रियों पर विजय पाने का मार्ग दिखाती है।”
आगामी दिनों में कथा में देवी के अन्य अवतारों और शक्तिपीठों की महिमा का वर्णन किया जाएगा। उन्होंने सभी नगरवासियों से इस आध्यात्मिक गंगा में डुबकी लगाने की अपील की है।
