

बिलासपुर। बहुचर्चित नसबंदी कांड में आखिरकार 12 साल बाद अदालत का फैसला आ गया है। सोमवार को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शैलेष केतारप की अदालत ने मामले में मुख्य आरोपी सर्जन डॉ. आर.के. गुप्ता को दोषी ठहराते हुए 2 साल की सजा सुनाई है, जबकि अन्य 5 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।
यह मामला 8 नवंबर 2014 का है, जब सेंदरी स्थित नेमीचंद जैन हॉस्पिटल में नसबंदी शिविर आयोजित किया गया था। शिविर में 43 महिलाओं का पंजीयन था, लेकिन मितानिनों द्वारा 83 महिलाओं को लाया गया। आरोप है कि डॉ. गुप्ता ने महज 3 घंटे में सभी महिलाओं के ऑपरेशन कर दिए। इस दौरान 13 महिलाओं की मौत हो गई थी, जिससे पूरे प्रदेश में हड़कंप मच गया था।

जांच में सामने आई लापरवाही
शुरुआती पोस्टमार्टम और रिपोर्ट में मौत का कारण सेप्टिसिमिया और सेप्टिक शॉक बताया गया, जो आमतौर पर अस्वच्छ उपकरणों और गंदे वातावरण के कारण फैलने वाले संक्रमण से होता है। जांच में यह भी पाया गया कि ऑपरेशन के दौरान उपयोग किए गए उपकरण ठीक से स्टरलाइज नहीं थे।
दवा में जहर का दावा निकला गलत
मामले में यह भी दावा किया गया था कि महिलाओं को दी गई सिप्रोसिन-500 दवा में चूहे मारने वाले जहर के अंश थे। इसी आधार पर दवा आपूर्ति करने वाली कंपनी महावर फार्मा के संचालकों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। हालांकि बाद में फॉरेंसिक जांच और संबंधित संस्थानों की रिपोर्ट में इस दावे की पुष्टि नहीं हो सकी, जिससे राज्य सरकार का पक्ष कमजोर पड़ गया।

अदालत में कमजोर पड़ा अभियोजन
जांच में विरोधाभास और लापरवाही के कारण अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि अन्य आरोपियों की इस घटना में प्रत्यक्ष भूमिका क्या थी। इसी के चलते अदालत ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
हाई कोर्ट ने भी लगाई थी फटकार
इस मामले में तत्कालीन सीएमएचओ डॉ. आर.के. भांगे और सर्जन डॉ. गुप्ता को राज्य सरकार ने बर्खास्त कर दिया था। बाद में हाई कोर्ट ने भी अपने फैसले में माना था कि दोनों डॉक्टर अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफल रहे और आवश्यक निगरानी व व्यवस्थाएं सुनिश्चित नहीं कर पाए।
राष्ट्रीय स्तर पर गूंजा था मामला
नसबंदी कांड उस समय राष्ट्रीय मुद्दा बन गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से फोन पर चर्चा की थी, वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी पीड़ित परिवारों से मिलने बिलासपुर पहुंचे थे।
इस फैसले के बाद एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था और नसबंदी शिविरों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।
