बिना एफआईआर होटल कारोबारी को भेजा गया जेल, हाई कोर्ट सख्त, अवैध गिरफ्तारी पर सरकार देगी 1 लाख का मुआवजा


बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भिलाई के एक होटल कारोबारी को बिना एफआईआर के गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने के मामले में कड़ी नाराजगी जताते हुए राज्य सरकार को 1 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि यह राशि सरकार जांच के बाद दोषी पुलिसकर्मियों से वसूल कर सकती है।
हाई कोर्ट ने गृह विभाग के सचिव को निर्देश दिए हैं कि पुलिस बल को मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
क्या है मामला
भिलाई निवासी आकाश कुमार साहू, जो कानून की पढ़ाई करने के साथ होटल का संचालन करते हैं, के होटल में 8 सितंबर 2025 को पुलिस एक गुमशुदा लड़की की तलाश में पहुंची थी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि पुलिस ने बिना महिला पुलिसकर्मी के कमरों की तलाशी ली। विरोध करने पर पुलिसकर्मियों ने गाली-गलौज और मारपीट की।
वहीं पुलिस का दावा था कि आकाश साहू ने सरकारी काम में बाधा डाली, पुलिस वाहन की चाबी छीन ली और चालक के साथ हाथापाई की, जिससे शांति भंग होने की आशंका पैदा हुई। इसी आधार पर पुलिस ने उन्हें भारतीय न्याय संहिता की धारा 170 के तहत हिरासत में लेकर जेल भेज दिया।
एफआईआर के बिना भेजा गया जेल
हाई कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी संज्ञेय अपराध में एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी। केवल संदेह और कहासुनी के आधार पर किसी नागरिक को जेल भेजना असंवैधानिक है। अदालत ने कहा कि हिरासत के दौरान दिया गया मानसिक तनाव और अपमान अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि कानून के अनुसार गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित रूप में गिरफ्तारी के कारण बताना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता ने गिरफ्तारी मेमो पर स्वयं लिखा था कि “मुझे मामले की जानकारी नहीं है।”
एसडीएम की भूमिका पर भी सवाल
हाई कोर्ट ने इस मामले में पुलिस के साथ-साथ एसडीएम की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट को न्यायिक प्रहरी की भूमिका निभानी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने बिना समुचित विचार किए पुलिस की रिपोर्ट पर मुहर लगाते हुए युवक को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
आपराधिक कार्यवाही निरस्त
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ शुरू की गई सभी आपराधिक कार्यवाहियों और पुलिस के इस्तगासा को निरस्त कर दिया है। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि चार सप्ताह के भीतर 1 लाख रुपये का मुआवजा याचिकाकर्ता को दिया जाए। सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी गई है कि वह जांच के बाद यह राशि दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूल कर सकती है।

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