

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बुजुर्गों के हित में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि संपत्ति इस उम्मीद में दी गई हो कि लेने वाला व्यक्ति बुढ़ापे में देखभाल करेगा, तो भले ही यह शर्त गिफ्ट डीड में लिखित रूप से दर्ज न हो, फिर भी उसकी जिम्मेदारी उठाना अनिवार्य है। सेवा और देखभाल न करने की स्थिति में गिफ्ट डीड को रद्द किया जा सकता है।
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने इस मामले में एसडीओ और कलेक्टर के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें बुजुर्ग दंपती के पक्ष में फैसला दिया गया था। भतीजे और बेटी द्वारा हाईकोर्ट में दायर याचिका को खारिज कर दिया गया।
मामला कोनी थाना क्षेत्र के कंचन विहार, बिलासपुर का है। यहां रहने वाले 83 वर्षीय सुरेशमणि तिवारी और उनकी 80 वर्षीय पत्नी लता तिवारी ने वर्ष 2016 में अपने भतीजे रामकृष्ण पांडे के नाम 1250 वर्गफीट जमीन और उस पर बने मकान की गिफ्ट डीड की थी। दंपती का कोई बेटा नहीं था, इसलिए उन्होंने यह संपत्ति इस भरोसे के साथ दी थी कि भतीजा जीवनभर उनकी सेवा और देखभाल करेगा।
बुजुर्ग दंपती का आरोप है कि संपत्ति मिलते ही भतीजे और उसकी बेटी ने उन्हें प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। उन्हें जबरन मकान की पहली मंजिल पर रहने को मजबूर किया गया, जहां सीढ़ियां चढ़ने में उन्हें भारी परेशानी होती थी। खाने-पीने और अन्य बुनियादी जरूरतों पर रोक लगा दी गई। इतना ही नहीं, बिजली और पानी का कनेक्शन काट दिया गया और उनके एटीएम से करीब 30 लाख रुपए निकाल लिए गए। अंततः दोनों को घर से बेदखल कर दिया गया, जिसके बाद वे वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हुए।
पीड़ित दंपती ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23 के तहत मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल में आवेदन किया था। एसडीओ और कलेक्टर ने मामले को सही पाते हुए गिफ्ट डीड रद्द करने का आदेश दिया था।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि गिफ्ट डीड प्यार और स्नेह के आधार पर इस उम्मीद में दी गई थी कि भविष्य में बुजुर्गों का ख्याल रखा जाएगा। जब इस उम्मीद और जिम्मेदारी का उल्लंघन हुआ और बुजुर्गों को प्रताड़ित किया गया, तो गिफ्ट डीड रद्द करना पूरी तरह न्यायसंगत है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए यह कानून एक सशक्त प्रावधान है और इसका उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान और सुरक्षा प्रदान करना है।
