

बिलासपुर। सरकार भले ही आम लोगों को निशुल्क शव वाहन उपलब्ध कराने के दावे करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। शुक्रवार को सिम्स अस्पताल में एक ऐसा मामला सामने आया, जिसने मुफ्त शव वाहन सेवा की व्यवस्था और उससे जुड़े तंत्र की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
हेमू नगर निवासी 27 वर्षीय संजू रजक, पिता सुरेश रजक, ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। शुक्रवार सुबह करीब 9 बजे उनका शव पोस्टमार्टम के लिए सिम्स की मर्चुरी लाया गया। दोपहर करीब 1 बजे पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिजनों ने सरकार की निशुल्क शव वाहन सेवा के लिए 1099 टोल-फ्री नंबर पर संपर्क किया।

परिजनों का आरोप है कि हर बार फोन करने पर उन्हें यही जवाब मिला कि “10 मिनट में शव वाहन पहुंच रहा है।” लेकिन इंतजार के बावजूद कोई वाहन नहीं पहुंचा। कई बार कॉल करने पर भी जिम्मेदार कर्मचारियों ने न तो स्पष्ट जानकारी दी और न ही शोकाकुल परिवार की पीड़ा को समझने का प्रयास किया।
करीब चार घंटे तक इंतजार करने के बाद जब कोई मदद नहीं मिली तो परिजन मजबूर होकर एक निजी शव वाहन संचालक से संपर्क करने को विवश हुए। उन्होंने 2,000 रुपये देकर शव वाहन की व्यवस्था की और मृतक का शव हेमू नगर स्थित अपने घर ले गए। हैरानी की बात यह रही कि तब तक भी सरकारी शव वाहन उपलब्ध नहीं कराया जा सका।
इस घटना ने सरकारी निशुल्क शव वाहन सेवा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शोक में डूबे परिवार को राहत देने के बजाय घंटों तक इंतजार कराना और केवल आश्वासन देते रहना व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करता है। ऐसे में जरूरत है कि संबंधित विभाग पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई करे, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को इस तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।
