

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने खांसी के सिरप (कफ सिरप) की बिक्री को लेकर नियमों में बड़ा बदलाव किया है। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी नए नियमों के अनुसार अब देश में कहीं भी बिना डॉक्टर की पर्ची के कफ सिरप नहीं बेचा जा सकेगा। यह नियम शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू होगा।
पहले ड्रग्स रूल्स की एंट्री नंबर-13 के तहत एक हजार से कम आबादी वाले गांवों में कफ सिरप की बिक्री को कुछ लाइसेंसिंग शर्तों से छूट प्राप्त थी, लेकिन सरकार ने अब यह छूट भी समाप्त कर दी है। मंत्रालय का कहना है कि दवाओं की गुणवत्ता, मरीजों की सुरक्षा और सिरप फॉर्मुलेशन पर निगरानी मजबूत करने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया है।
नए नियमों के तहत खांसी के सिरप का निर्माण, वितरण और बिक्री केवल निर्धारित लाइसेंसिंग और नियामकीय शर्तों के अनुसार ही होगी। छोटे गांवों में भी अब कफ सिरप सिर्फ लाइसेंस प्राप्त फार्मेसी के माध्यम से और निर्धारित नियमों के तहत उपलब्ध कराया जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार दिसंबर में इस संबंध में ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर संबंधित पक्षों से सुझाव और आपत्तियां मांगी गई थीं। प्राप्त सुझावों के बाद सरकार ने नियमों में संशोधन का फैसला लिया है।
हालांकि, इस फैसले को लेकर आम लोगों में नाराजगी भी देखने को मिल रही है। लोगों का कहना है कि सर्दी-खांसी एक सामान्य बीमारी है, जिससे अधिकांश लोग समय-समय पर प्रभावित होते हैं और अक्सर मेडिकल स्टोर से साधारण कफ सिरप लेकर ठीक भी हो जाते हैं। ऐसे में अब 30 से 50 रुपये की दवा खरीदने के लिए पहले डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा, जहां परामर्श शुल्क 300 से 500 रुपये या उससे अधिक भी हो सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों और निम्न आय वर्ग के लोगों का मानना है कि इस नियम से इलाज का खर्च बढ़ेगा और छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए भी डॉक्टरों पर निर्भरता बढ़ जाएगी। वहीं कुछ लोग इसे आम मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने वाला निर्णय बता रहे हैं।
दूसरी ओर स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कई कफ सिरप में ऐसे तत्व होते हैं जिनका गलत या अत्यधिक उपयोग स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए नियंत्रित बिक्री से दवाओं के दुरुपयोग को रोकने और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
फिलहाल सरकार का तर्क है कि यह कदम सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उठाया गया है, जबकि आम जनता का एक वर्ग इसे व्यावहारिक कठिनाइयों और बढ़ते इलाज खर्च के नजरिए से देख रहा है।
