

न्यायधानी बिलासपुर के हृदय स्थल, सरकण्डा स्थित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में चैत्र वासंतिक नवरात्र के पावन अवसर पर आयोजित नौ दिवसीय श्रीमद् देवी भागवत महापुराण कथा ज्ञानयज्ञ अपने तीसरे सोपान पर पहुँच चुका है। 19 मार्च से प्रारंभ हुआ यह दिव्य महोत्सव अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा से संपूर्ण क्षेत्र को भक्तिमय कर रहा है।
ब्रह्मलीन परमपूज्य श्री 108 स्वामी शारदानन्द सरस्वती जी महाराज के दिव्य आशीर्वाद और पीठाधिश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज के कुशल सानिध्य में आयोजित इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य विश्व शांति, राष्ट्र कल्याण और सनातन धर्म की सुदृढ़ता है। प्रथम दिन प्रज्ज्वलित किए गए 119 श्री मनोकामना घृत अखण्ड ज्योति कलश अपनी आभा से मंदिर की दिव्यता को द्विगुणित कर रहे हैं।

श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के नौ दिवसीय पारायण में तीसरा दिन ‘भक्ति की शक्ति’ और ‘शरणागति के फल’ को समर्पित है। सुप्रसिद्ध कथा व्यास आचार्य श्री मुरारीलाल त्रिपाठी’राजपुरोहित’ (कटघोरा-कोरबा) ने तीसरे दिन की कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को जीवन के सबसे कठिन संघर्षों से बाहर निकलने का मार्ग बताया।
विषम परिस्थितियों में अडिग विश्वास
तीसरे दिन की कथा का मुख्य केंद्र अयोध्या के राजकुमार सुदर्शन का चरित्र है। कथा के अनुसार, सुदर्शन को बाल्यावस्था में ही पारिवारिक षड्यंत्रों के कारण राज्य से निष्कासित कर दिया गया था। अपनी माता मनोरमा के साथ वे भारद्वाज ऋषि के आश्रम में शरण लेते हैं। व्यास पीठ से आचार्य जी ने बताया कि जब मनुष्य के पास कोई सहारा नहीं होता, तब केवल ‘आद्याशक्ति’ ही उसकी रक्षा करती हैं। सुदर्शन ने वन में रहते हुए अनजाने में ही बीजमंत्र ‘क्लीं’ का श्रवण किया और उसका निरंतर जाप प्रारंभ किया। उनकी इस अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर साक्षात जगदम्बा प्रकट हुईं और उन्हें ‘अजेय धनुष’ और ‘अक्षय तरकश’ प्रदान किया। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि मंत्र की शक्ति और माता की कृपा से एक निर्बल बालक भी चक्रवर्ती सम्राट बन सकता है।

तीसरे दिन की कथा में उस दिव्य क्षण का भी वर्णन किया गया जब महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित समस्त देवताओं ने अपने तेज को पुंजीभूत किया। देवताओं के उस सम्मिलित तेज से एक अलौकिक नारी शक्ति का प्राकट्य हुआ, जिन्हें हम ‘महिषासुर मर्दिनी’ के रूप में पूजते हैं।
व्यासपीठ से यह संदेश दिया गया कि जब अधर्म चरम पर होता है, तब शक्ति का संचय ही एकमात्र विकल्प होता है। देवी का प्राकट्य न केवल असुरों के संहार के लिए था, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना के लिए भी था।
नवरात्र के तीसरे दिन माँ दुर्गा के तृतीय स्वरूप माँ चंद्रघंटा की पूजा का विधान है। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, जिसकी गर्जना से दुष्ट और भयभीत होते हैं। आचार्य श्री ने समझाया कि जो भक्त देवी के इस रूप की शरण में आता है, उसे अपार साहस और विनम्रता की प्राप्ति होती है।
पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज के नेतृत्व में मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों की अविरल धारा बह रही है:
अभिषेक और पूजन: प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में श्री शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव का रुद्राभिषेक संपन्न हो रहा है। इसके पश्चात श्री महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का श्रीसूक्त के दिव्य मंत्रों द्वारा दुग्धाभिषेक किया जा रहा है।
माँ बगलामुखी का श्रृंगार, पूजन : पीताम्बरा पीठ में अधिष्ठात्री देवी माँ बगलामुखी का प्रतिदिन विभिन्न स्वरूपों में दिव्य श्रृंगार किया जा रहा है, जिसके दर्शन हेतु दूर-दराज से श्रद्धालु उमड़ रहे हैं।
संगीतमय कथा: प्रतिदिन अपराह्न 3:00 बजे से कथा का सस्वर वाचन हो रहा है, जिसमें भजनों की स्वर लहरियों पर भक्त भावविभोर हो रहे हैं।
श्रीमद् देवी भागवत का तीसरा दिन हमें यह सिखाता है कि ‘संकल्प और साधना’ से भाग्य को बदला जा सकता है। राजा सुदर्शन की कथा केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो संघर्षों से घिरा हुआ है। यदि साधक अपने इष्ट के प्रति पूर्ण समर्पित है, तो ब्रह्मांड की समस्त शक्तियां उसकी सहायता के लिए तत्पर हो जाती हैं।
सभी धर्मप्रेमी नागरिकों से सपरिवार इस नौ दिवसीय ज्ञानयज्ञ में सम्मिलित होने का अनुरोध किया है “माँ की कथा का श्रवण केवल कानों का सुख नहीं, बल्कि आत्मा का शुद्धिकरण है। इस कलिकाल में श्रीमद् देवी भागवत ही वह नौका है जो हमें भवसागर से पार लगा सकती है।”
