5 साल की नन्ही गार्गी सिंह बनी आस्था की मिसाल, कठोर चैत्र नवरात्रि व्रत रखकर सबको कर रही प्रेरित

प्रवीर भट्टाचार्य


बिलासपुर। अगर माता-पिता और परिवार में अच्छे संस्कार हो तो निश्चित रूप से इसका प्रभाव बच्चों पर भी पड़ता है । ऐसा ही सकारात्मक प्रभाव 5 साल की गार्गी सिंह में भी नजर आ रहा है जो इस बार चैत्र नवरात्रि का कठिन व्रत कर रही है ।

जहां आज के दौर में छोटे-छोटे बच्चे मोबाइल और आधुनिक जीवनशैली में व्यस्त नजर आते हैं, वहीं बिलासपुर की 5 साल की नन्ही बालिका गार्गी सिंह अपनी गहरी आस्था और संस्कारों से सभी का ध्यान आकर्षित कर रही है। इतनी कम उम्र में जहां बच्चे ठीक से बोलना और पढ़ना सीख रहे होते हैं, वहीं गार्गी सिंह पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ चैत्र नवरात्रि का कठिन व्रत रखकर एक अनोखी मिसाल पेश कर रही है।


सरकंडा सुभाष चौक निवासी होटल व्यवसायी करण सिंह कछवाहा और बिंदु सिंह कछवाहा की पुत्री गार्गी सिंह ने चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन प्रतिपदा की सुबह स्नान-ध्यान कर विधिवत पूजा-अर्चना के साथ अपने नौ दिवसीय व्रत का संकल्प लिया। इसके बाद वह सरकंडा स्थित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर पहुंची, जहां मंदिर के पुजारी मधुसूदन पांडेय से आशीर्वाद प्राप्त कर माता रानी की आराधना की।


नन्ही गार्गी की भक्ति और अनुशासन देखकर हर कोई अचंभित है। वह पूरे नौ दिनों तक केवल दूध और फल ग्रहण करेगी। इतना ही नहीं, गार्गी ने इस दौरान जूते-चप्पल त्याग कर नंगे पांव चलने का भी संकल्प लिया है, जो उसकी अटूट श्रद्धा और समर्पण को दर्शाता है।


चैत्र नवरात्रि का व्रत बड़े-बड़ों के लिए भी कठिन माना जाता है, खासकर गर्मी के मौसम में जब बिना अन्न और कई बार बिना जल के उपवास रखना चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में 5 साल की मासूम बच्ची द्वारा इस व्रत को पूरे नियम और निष्ठा के साथ निभाना लोगों के लिए प्रेरणा बन गया है।


गार्गी सिंह की इस धार्मिक आस्था के पीछे उसके परिवार के संस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उसकी माता बिंदु सिंह कछवाहा बताती हैं कि गार्गी बचपन से ही पूजा-पाठ में रुचि लेती है और परिवार के साथ धार्मिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए गर्व का विषय है कि उनके बच्चों में भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं के प्रति इतनी गहरी आस्था है।


बिंदु सिंह का कहना है कि आज के समय में जहां बच्चे पाश्चात्य संस्कृति की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं, वहीं गार्गी जैसी बच्चियों को देखकर आत्मिक संतुष्टि मिलती है। यह विश्वास भी मजबूत होता है कि आने वाली पीढ़ी हमारी सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर आगे बढ़ाएगी।


परिवार का पूरा सहयोग गार्गी के साथ है, ताकि वह अपना यह व्रत सफलतापूर्वक पूर्ण कर सके। साथ ही नवरात्रि के इन पावन दिनों में परिवार देवी मंदिरों में दर्शन-पूजन भी करेगा।
नन्ही गार्गी सिंह आज केवल एक बच्ची नहीं, बल्कि श्रद्धा, संस्कार और आस्था की जीवंत प्रतीक बनकर समाज को यह संदेश दे रही है कि अगर परिवार में अच्छे संस्कार हों, तो उनकी चमक अगली पीढ़ी में भी साफ दिखाई देती है।

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