

राजस्थानी मारवाड़ी अग्रवाल समाज में गणगौर पूजा आस्था, सौभाग्य और पारिवारिक परंपराओं का महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यह पर्व विशेष रूप से विवाहित महिलाओं और नवविवाहित बहुओं के लिए बेहद खास होता है। होली दहन के बाद की मिट्टी से गणगौर माता की प्रतिमा बनाकर पूजा की जाती है और पूरे विधि-विधान के साथ यह उत्सव कई दिनों तक मनाया जाता है।

परंपरा के अनुसार होली दहन की पवित्र मिट्टी से गणगौर (भगवान शिव और माता पार्वती के प्रतीक) की प्रतिमा बनाई जाती है। इसके बाद महिलाएं और युवतियां रोज सुबह पूजा-अर्चना करती हैं तथा शाम को सज-संवर कर गणगौर माता को जल अर्पित करने के लिए समूह में जाती हैं। जल लाने और पूजा के दौरान पारंपरिक गणगौर गीत गाए जाते हैं, जिससे वातावरण भक्तिमय और उत्सवमय हो जाता है।
यह पूजा होली के दूसरे दिन से शुरू होकर लगभग 16 दिनों तक चलती है और चैत्र मास की तृतीया तिथि, यानी गणगौर के दिन इसका विधिवत समापन किया जाता है। इस दौरान महिलाएं अपने सुहाग, परिवार की सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन की खुशहाली के लिए माता गणगौर की आराधना करती हैं।

इसी परंपरा को निभाते हुए स्थानीय परिवारों में भी श्रद्धा और उत्साह के साथ गणगौर पूजा की जा रही है। नवविवाहिता दीक्षा सराफ के लिए यह उनकी पहली गणगौर है। उन्होंने बताया कि उनके मायके में गणगौर पूजा की परंपरा नहीं है, लेकिन ससुराल में आकर उन्हें इस पूजा में भाग लेने का अवसर मिला है।
दीक्षा सराफ ने बताया कि उन्हें पहले से इस पूजा के बारे में सुनने को मिला था, लेकिन जब उन्होंने स्वयं इसमें भाग लिया तो अनुभव बेहद आनंददायक रहा। वे बताती हैं कि रोज सुबह पूजा करती हैं और शाम को सज-संवर कर अपनी जेठानी के साथ दूर-दूर से जल लाकर गणगौर माता को अर्पित करती हैं। इस दौरान दोनों मिलकर पारंपरिक गीत भी गाती हैं और पूरे उत्साह के साथ पर्व का आनंद लेती हैं।
दीक्षा ने कहा कि उनकी सासु मां और परिवार के अन्य सदस्यों का उन्हें पूरा सहयोग मिलता है। अगले दिन की तैयारी वे रात में ही कर लेती हैं ताकि सुबह पूजा-विधान में किसी प्रकार की परेशानी न हो।

वहीं जिज्ञासा सराफ ने बताया कि उन्होंने भी गणगौर पूजा की शुरुआत ससुराल में ही की थी। अब अपनी देवरानी के साथ फिर से इस पूजा में शामिल होकर उन्हें काफी खुशी और उत्साह महसूस हो रहा है।
परिवार की वरिष्ठ सदस्य सपना सराफ भी इस पूजा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे रात में ही पूजा की सारी तैयारियां करवा देती हैं ताकि सुबह पूजा विधि आसानी से संपन्न हो सके।
इस तरह राजस्थानी अग्रवाल समाज में गणगौर पूजा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह परिवार की परंपराओं, आपसी स्नेह और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत बनाए रखने का सुंदर माध्यम बन गई है।

