

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि पति और उसके परिजनों पर दहेज उत्पीड़न तथा टोनही प्रताड़ना जैसे गंभीर आरोप झूठे तौर पर लगाना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। अदालत ने इस आधार पर पति की तलाक याचिका स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया।
न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।
मामले के अनुसार, बलौदा बाजार निवासी दिनेश साहू और पद्मा साहू का विवाह 15 फरवरी 2015 को हुआ था। पति का आरोप था कि विवाह के 10-11 दिन बाद ही पत्नी मायके चली गई और अलग रहने का दबाव बनाने लगी। इसके बाद पत्नी ने पति, उसके माता-पिता और भाइयों सहित परिवार के पांच सदस्यों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना (धारा 498ए) और छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करा दी।
पति ने बलौदा बाजार फैमिली कोर्ट में क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की थी, जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं। इसके विरुद्ध पति ने हाई कोर्ट में अपील दायर की।
7 वर्षों तक झेलनी पड़ी मानसिक पीड़ा
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि टोनही जैसे अपमानजनक और गंभीर आरोप न केवल सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाते हैं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले आपराधिक मुकदमों के कारण मानसिक यातना भी देते हैं। अदालत ने माना कि पति और उसके परिवार को सात वर्षों तक झूठे मामलों का सामना करना पड़ा, जो अपने आप में मानसिक क्रूरता है।
खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए पति के पक्ष में तलाक की डिक्री जारी कर दी। साथ ही पत्नी को यह स्वतंत्रता दी गई है कि वह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता के लिए अलग से आवेदन प्रस्तुत कर सकती है।
