इस वर्ष 2 मार्च की रात होलिका दहन, 3 को चंद्रग्रहण; रंगों वाली होली होगी 4 मार्च को


इस वर्ष होलिका दहन 2 और 3 मार्च की दरम्यानी रात किया जाएगा, जबकि 3 मार्च को चंद्रग्रहण होने के कारण रंगोत्सव 4 मार्च को मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस बार रंग वाली होली और होलिका दहन के बीच एक दिन का अंतर रहेगा।


पूर्णिमा और भद्रा का संयोग
ज्योतिषीय गणना के मुताबिक 2 मार्च शाम 5.55 बजे से पूर्णिमा तिथि प्रारंभ होकर 3 मार्च शाम 5.07 बजे तक रहेगी। भद्रा 2 मार्च शाम 5 बजे से लगकर 3 मार्च सुबह 5.32 बजे तक रहेगी। शास्त्रों के अनुसार यदि होलिका पर्व पर भद्रा अर्द्धरात्रि पार कर ऊषा काल तक पहुंच जाए तो भद्रा युक्त प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा में भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा पुच्छ काल में होलिका दहन करना श्रेष्ठ माना गया है।


देव पंचांग के अनुसार होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 2 और 3 मार्च की दरम्यानी रात 1.26 बजे से 2.38 बजे तक रहेगा।
3 मार्च को चंद्रग्रहण
3 मार्च को चंद्रग्रहण रहेगा, जो भारत में दिखाई देगा। ग्रहण के दौरान पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र और सिंह राशि का संयोग रहेगा। ग्रहण का सूतक सुबह से ही प्रभावी माना जाएगा। इसी कारण 3 मार्च को रंग-गुलाल खेलना उचित नहीं माना गया है। परंपरा के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को रंगोत्सव मनाया जाता है, इसलिए 4 मार्च को होली खेली जाएगी।


होली का सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व
ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि होली को केवल रंगों और उत्साह का पर्व मानना इसकी गहराई को सीमित करना है। वैदिक परंपरा में अग्नि को शुद्धि और रूपांतरण का प्रतीक माना गया है। ऋग्वेद में अग्नि को देवताओं और मनुष्यों के बीच सेतु बताया गया है। होलिका दहन इसी वैदिक विचार का विस्तार है, जो नकारात्मकता, अहंकार और द्वेष के त्याग का सार्वजनिक संकल्प है।
रंगोत्सव को अद्वैत दर्शन की सामाजिक अभिव्यक्ति भी माना गया है। उपनिषदों में वर्णित एकत्व का भाव रंगों के माध्यम से समाज में प्रकट होता है, जहां लोग भेदभाव भूलकर एक-दूसरे से जुड़ते हैं।


पर्यावरण संरक्षण की अपील
ज्योतिषाचार्यों ने अपील की है कि होली परंपरागत और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से मनाई जाए। प्राकृतिक रंगों का उपयोग स्वास्थ्य और प्रकृति दोनों के लिए सुरक्षित है, जबकि रासायनिक रंगों से नुकसान हो सकता है। होली का मूल संदेश—शुद्धि, संतुलन और प्रकृति के साथ सामंजस्य—को ध्यान में रखकर ही उत्सव मनाना चाहिए।
इस प्रकार होली केवल आनंद का पर्व नहीं, बल्कि आत्ममंथन, सामाजिक समरसता और नवआरंभ का प्रतीक भी है।

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