छत्तीसगढ़ में राज्यसभा प्रतिनिधित्व पर तेज हुआ विमर्श: उराँव समाज की भागीदारी, धर्मांतरण और राजनीतिक संतुलन केंद्र में


रायपुर, फरवरी 2026।
छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के लिए दो सदस्यों का कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त होने जा रहा है। इसके साथ ही प्रदेश की राजनीति में सामाजिक संतुलन, जनजातीय प्रतिनिधित्व और विशेष रूप से उराँव समाज की राजनीतिक भागीदारी को लेकर बहस तेज हो गई है। राजनीतिक गलियारों में इसे केवल एक संसदीय औपचारिकता नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश और भविष्य की दिशा तय करने वाला अवसर माना जा रहा है।
जनसंख्या बनाम प्रतिनिधित्व का सवाल
2011 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ की कुल आबादी का लगभग 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अनुसूचित जनजातियों का है। इनमें गोंड, कंवर और उराँव प्रमुख समुदाय हैं।
अब चर्चा इस बात को लेकर है कि—
गोंड समाज को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व मिल चुका है।
कंवर समाज को लोकसभा में अवसर प्राप्त हुआ है।
किंतु उराँव समाज, जो जनसंख्या की दृष्टि से तीसरे स्थान पर है, संसद के दोनों सदनों में प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व से अब तक वंचित रहा है।
उराँव समाज के बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि संख्या में मजबूत होने के बावजूद नीति-निर्माण के मंचों पर उनकी उपस्थिति नगण्य है। उनका तर्क है कि जनसंख्या अनुपात के अनुरूप राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि समाज की आवाज राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे।
सत्ता और संगठन में सीमित भागीदारी का आरोप
समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि—
राज्य सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर उराँव समाज की भागीदारी अपेक्षित स्तर पर नहीं है।
निगम, मंडल, आयोग और अन्य शासकीय संस्थाओं में अवसर सीमित रहे हैं।
प्रमुख राजनीतिक दलों के संगठनात्मक ढांचे में भी शीर्ष स्तर पर समाज की उपस्थिति कम दिखाई देती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वास्तविक सशक्तिकरण केवल चुनावी टिकट तक सीमित नहीं होता, बल्कि निर्णय-प्रक्रिया और संगठनात्मक संरचना में भागीदारी से तय होता है। यदि किसी समाज को नीति-निर्माण में पर्याप्त स्थान नहीं मिलता, तो उपेक्षा की भावना स्वाभाविक रूप से जन्म लेती है।
धर्मांतरण और सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न
उराँव समाज के भीतर धर्मांतरण का मुद्दा भी इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार आर्थिक अभाव, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा सामाजिक असुरक्षा जैसे कारणों से समाज का एक वर्ग ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हो रहा है।
बुजुर्गों और परंपरागत सरना आस्था से जुड़े लोगों का कहना है कि—
प्रकृति-पूजा, ग्राम देवालय और सामुदायिक अनुष्ठानों में सहभागिता घट रही है।
विवाह, पर्व-त्योहारों और सामूहिक आयोजनों में पहले जैसी एकता नहीं दिखती।
गांवों और परिवारों के भीतर वैचारिक विभाजन की स्थिति बन रही है।
विश्लेषकों का मत है कि यदि समाज को प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से रखा जा सकता है। इससे धर्मांतरण जैसे संवेदनशील विषय पर संतुलित और संवैधानिक ढांचे में समाधान खोजने की दिशा बन सकती है।
राजनीतिक समीकरण और संभावित नाम
उराँव समाज को लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का समर्थक वर्ग माना जाता रहा है। ऐसे में समाज के भीतर उठ रही उपेक्षा की भावना राजनीतिक दलों के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।
राजनीतिक गलियारों में उराँव समाज से जुड़े कुछ नामों की चर्चा चल रही है। जशपुर से श्री गणेश राम भगत और डॉ. बी.एल. भगत, रायगढ़ से श्री पनतराम भगत तथा सरगुजा से श्री बंसीधर उराँव और डॉ. आजाद भगत के नाम सामने आ रहे हैं।
वहीं यदि युवा नेतृत्व को अवसर देने की रणनीति अपनाई जाती है, तो श्री रवि भगत (लैलूंगा), श्री वेद प्रकाश भगत (फरसाबहार), श्री बलराम भगत (दोकड़ा), श्री इंदर भगत (अंबिकापुर) और श्री दिलमन मिंज (जशपुर) जैसे सक्रिय युवाओं के नाम भी चर्चा में बताए जा रहे हैं।
हालांकि किसी भी नाम पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि इस बार का चयन सामाजिक संदेश के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होगा।
सामाजिक संतुलन की कसौटी
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि उराँव समाज को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व दिया जाता है, तो—
सामाजिक संतुलन और समावेशन का स्पष्ट संदेश जाएगा।
जनजातीय क्षेत्रों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी आवाज मिल सकती है।
सांस्कृतिक संरक्षण, शिक्षा और रोजगार आधारित योजनाओं पर केंद्रित नीति-निर्माण को गति मिल सकती है।
निर्णायक क्षण
राज्यसभा का आगामी चुनाव केवल संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समावेशन की कसौटी बनता जा रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि राजनीतिक नेतृत्व इस अवसर को सामाजिक संतुलन की दिशा में ऐतिहासिक कदम में बदलता है या यह मुद्दा भविष्य के विमर्श तक सीमित रह जाता है।
छत्तीसगढ़ की जनजातीय राजनीति में यह क्षण आने वाले वर्षों की दिशा और सामाजिक समीकरण तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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