गुप्त नवरात्रि के नवमी को श्री पीताम्बरा पीठ में कमला देवी के रूप में कन्याओ का पूजन किया गया

सरकंडा स्थित सुभाष चौक के प्रतिष्ठित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में माघ गुप्त नवरात्रि का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा हैं।इस अवसर पर नवमी को माँ श्री ब्रह्मशक्ति बगलामुखी देवी का पूजन आराधना मातंगी एवं कमला देवी के रूप में किया गया,साथ ही कन्यापूजन का आयोजन किया गया, इसी के साथ ही गुप्त नवरात्रि संपन्न हुआ।साथ ही प्रातःकालीन श्री शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव का रुद्राभिषेक, पूजन एवं परमब्रह्म मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जी का पूजन,श्रृंगार, श्री सिद्धिविनायक जी का पूजन श्रृंगार,एवं श्री महाकाली,महालक्ष्मी, महासरस्वती राजराजेश्वरी, त्रिपुरसुंदरी देवी का श्रीसूक्त षोडश मंत्र द्वारा दूधधारियाँ पूर्वक अभिषेक किया जा रहा है।

पीतांबरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने बताया कि माता मातंगी और माता कमला दस महाविद्याओं में नवीं और दसवीं महाविद्या है।

नवी महाविद्या माता मातंगी इन्हें “तांत्रिक सरस्वती” माना जाता है। ये ज्ञान, संगीत और कला की अधिष्ठात्री हैं।मतंग मुनि ने सभी प्राणियों पर नियंत्रण पाने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता आदिशक्ति ने उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया, इसलिए उनका नाम मातंगी पड़ा।माता मातंगी को मुख्य रूप से ‘त्रिपुर सुंदरी’ की मंत्री माना जाता है। ललिता सहस्रनाम के अनुसार, जब भंडसुर नाम के राक्षस के साथ युद्ध हुआ था, तब मातंगी देवी (जिन्हें वहां ‘श्यामला’ या ‘मंत्रीणी’ कहा गया) ने विशुक्र नाम के असुर का वध किया था, जो भंडसुर का भाई था।

दसवीं एवं अंतिम महाविद्या माता कमला इन्हें “तांत्रिक लक्ष्मी” कहा जाता है। ये सुख, समृद्धि और सौभाग्य की देवी हैं।माता कमला की उत्पत्ति की सबसे प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन की है। जब देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए समुद्र को मथा, तब चौदह रत्नों में से एक के रूप में माता लक्ष्मी (कमला) प्रकट हुईं। वे कमल के फूल पर विराजमान थीं और हाथियों ने उनका अभिषेक किया था।जब सती ने शिव को अपने दस रूप दिखाए थे, तब उनमें से अंतिम और सबसे शांत व वैभवशाली रूप माता कमला का था।लक्ष्मी या कमला को संहारक देवी नहीं माना जाता, वे पालनकर्ता और वरदान देने वाली हैं। हालांकि, तांत्रिक ग्रंथों में उन्हें ‘भैरवी’ का सौम्य रूप माना जाता है। विशेष युद्ध प्रसंगों में, उन्होंने अपनी माया और शक्ति से दरिद्रता और अलक्ष्मी (अशुभ शक्तियों) का नाश किया है। चूँकि वे साक्षात शक्ति का रूप हैं, इसलिए वे सभी राक्षसी प्रवृत्तियों का अंत करने में सक्षम मानी जाती हैं।

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