

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) सरकंडा स्थित सुभाष चौक के प्रतिष्ठित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में इस वर्ष माघ गुप्त नवरात्रि का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। कड़ी में पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का महापर्व मनाया गया वसंत पंचमी ज्ञान और नई चेतना के उदय का पर्व है। जहां सरस्वती ज्ञान, कला, संगीत, वाणी की अधिष्ठात्री देवी है वही माँ भुवनेश्वरी ब्रह्मांड की आधारभूत शक्ति हैं। गुप्त नवरात्रि के छठवें दिन माता का छिन्नमस्ता देवी के रूप में पूजन आराधना किया जाएगा।
बसंत पंचमी के पावन पर्व पर गौरी पाण्डेय का विद्यारंभ संस्कार संपन्न हुआ। एवं बसंत पंचमी के पावन पर्व पर श्री विशेषर सिंह पटेल अध्यक्ष गौ सेवा आयोग छत्तीसगढ़ शासन माता श्री ब्रह्म शक्ति बगलामुखी देवी का दर्शन लाभ प्राप्त किए।
पीतांबरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने बताया कि माता छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में छठी महाविद्या मानी जाती हैं। उनका स्वरूप अत्यंत उग्र, विस्मयकारी और रहस्यमयी है। वे माँ दुर्गा का ही एक शक्तिशाली रूप हैं, जिन्हें ‘प्रचण्ड चण्डिका’ के नाम से भी जाना जाता है।
माँ अपने एक हाथ में अपना ही कटा हुआ मस्तक धारण किए हुए हैं।उनके गले से रक्त की तीन धाराएं निकलती हैं।उनके साथ उनकी दो सहचरियां होती हैं। रक्त की दो धाराएं ये दोनों सहचरियां पीती हैं और तीसरी धारा स्वयं देवी (कटा हुआ मस्तक) ग्रहण करती है।
एक बार माता पार्वती अपनी दो सहचरियों (जया और विजया) के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान के बाद सहचरियों को बहुत तेज भूख लगी। भूख के कारण उनका रंग काला पड़ने लगा और वे भूख से तड़पने लगीं। उन्होंने माता से भोजन की प्रार्थना की। माता ने उनसे धैर्य रखने को कहा, लेकिन उनकी व्याकुलता बढ़ती ही गई।
अपनी सखियों की भूख मिटाने के लिए माता ने अपनी खड्ग से अपना ही सिर काट दिया। सिर कटते ही उनके गले से रक्त की तीन धाराएं फूटीं। दो धाराएं उनकी सहचरियों के मुख में गईं और तीसरी धारा से माता ने स्वयं अपना रक्त पान किया। इस निस्वार्थ त्याग के कारण वे छिन्नमस्ता (छिन्न + मस्तक) कहलाईं।
देवी का कटा हुआ सिर इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान और मोक्ष पाने के लिए व्यक्ति को अपने ‘अहं’ (Ego) का त्याग करना पड़ता है।इनकी उपासना से गुप्त शत्रुओं का नाश होता है और व्यक्ति को कोर्ट-कचहरी या विवादों में विजय मिलती है।योग मार्ग में माँ छिन्नमस्ता का संबंध ‘मणिपुर चक्र’ से है। उनकी साधना से कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने में सहायता मिलती है।वे अपने भक्तों के हर मानसिक और शारीरिक कष्ट को तुरंत हर लेती हैं, इसलिए उन्हें ‘चिंतपूर्णी’ (चिंताओं को दूर करने वाली) भी कहा जाता है।
