

बिलासपुर।
शहर को हाईटेक पहचान देने और नागरिकों को डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्मार्ट सिटी मिशन के तहत नगर निगम सीमा में आने वाले मकानों पर लगाए गए क्यूआर कोड पूरी तरह फेल साबित हो गए हैं। करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद न तो लोग घर बैठे प्रॉपर्टी टैक्स और पानी का बिल जमा कर पा रहे हैं और न ही नगर निगम से जुड़ी शिकायतों का ऑनलाइन समाधान हो सका है। हालत यह है कि अधिकांश मकानों के दरवाजों से ये क्यूआर कोड अब गायब हो चुके हैं।
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत पहले शहर के हजारों घरों में क्यूआर कोड लगाए गए थे। दावा किया गया था कि इन्हें स्कैन कर मकान मालिक प्रॉपर्टी टैक्स, जलकर समेत अन्य शुल्क ऑनलाइन जमा कर सकेंगे और सड़क, नाली, स्ट्रीट लाइट, सीवरेज जैसी समस्याओं की शिकायत मोबाइल ऐप के जरिए दर्ज करा सकेंगे। लेकिन जब यह व्यवस्था काम नहीं कर पाई तो दोबारा डिजिटल नेम प्लेट युक्त बार कोड लगाए गए। इसके बावजूद न टैक्स कलेक्शन में कोई बढ़ोतरी हुई और न ही नगर निगम की सेवाओं में सुधार नजर आया।
8.59 करोड़ खर्च, नतीजा शून्य
स्मार्ट सिटी प्रबंधन ने यह काम हैदराबाद की नार्थ साउथ प्राइवेट लिमिटेड को 8.59 करोड़ रुपए में सौंपा था। इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद भी शहरवासियों को इसका कोई ठोस लाभ नहीं मिला। पहले घरों पर लगे साधारण मकान नंबर केवल पहचान तक सीमित थे, लेकिन उन्हें डिजिटल रूप देने की योजना आधी-अधूरी तैयारी और लापरवाही के कारण पूरी तरह फ्लॉप हो गई। वर्तमान में कई मकानों से क्यूआर कोड हट चुके हैं और जहां लगे भी हैं, वे निष्क्रिय पड़े हैं।
अन्य शहरों में सफल, यहां सिस्टम ठप
इंदौर, नागपुर जैसे कई स्मार्ट शहरों में डिजिटल नेम प्लेट में लगे बार कोड के जरिए संपत्तिकर, जलकर, समेकित कर और यूजर चार्ज जमा किए जा रहे हैं। वहां स्मार्ट वर्किंग जमीन पर नजर आ रही है, जबकि बिलासपुर में सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा। इस मामले में जब स्मार्ट सिटी के अधिकारियों से चर्चा की गई तो वे इसे पुरानी योजना बताते हुए जानकारी से बचते नजर आए।
कुल मिलाकर, स्मार्ट सिटी के नाम पर की गई यह पहल शहरवासियों के लिए सिर्फ दिखावा बनकर रह गई है, जिसमें करोड़ों रुपए खर्च हुए, लेकिन सुविधाएं कागजों तक ही सीमित रह गईं।
