दुर्लभ खगोलीय व आध्यात्मिक संयोग: वर्ष 2026 का ‘महा-ज्येष्ठ’ होगा 60 दिनों का, 17 मई से राजगीर और मदसरवा में उमड़ेगा आस्था का जनसैलाब

भारतीय काल-गणना केवल पंचांग के पन्ने नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान और ऋषियों की तपस्या का जीवंत अभिलेख है। वर्ष २०२६ का ज्येष्ठ मास एक ऐसा ही दुर्लभ अवसर लेकर आ रहा है, जहाँ प्रकृति और आध्यात्मिकता का एक अनूठा संगम देखने को मिलेगा। इस वर्ष ‘अधिक मास’ के जुड़ जाने से ज्येष्ठ का महीना लगभग ६० दिनों का होगा, जिसे पौराणिक भाषा में ‘महा-ज्येष्ठ’ या ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाता है।
श्री पीताम्बरा पीठ के पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने इस दुर्लभ संयोग के विषय में विस्तार से बताते हुए कहा कि ब्रह्मांडीय गति के अनुसार सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच प्रति वर्ष ११ दिनों का अंतर आता है। इस अंतर को पाटने के लिए हर ३२ माह बाद एक ‘अधिक मास’ की व्यवस्था की गई है। प्राचीन काल में इसे ‘मलमास’ कहकर उपेक्षित किया गया था, लेकिन भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ देकर जगत का सबसे पवित्र महीना बना दिया। वर्ष २०२६ में यह दिव्य संयोग १७ मई से १५ जून के बीच बन रहा है, जहाँ ज्येष्ठ की तपती गर्मी भक्तों के लिए अक्षय पुण्य का मार्ग प्रशस्त करेगी।

  • ब्रह्मांड का केंद्र बनेगा राजगीर (प्राचीन राजगृह):
    महाराज श्री ने बताया कि इस पावन अवधि में नालंदा जिले का राजगीर ब्रह्मांड का केंद्र बन जाता है। पौराणिक संदर्भों के अनुसार, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र मगध नरेश राजा वसु ने यहाँ एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था, जिसके प्रभाव से स्वर्ग के द्वार खुल गए थे। मान्यता है कि मलमास के दौरान ३३ कोटि देवी-देवता राजगीर के पवित्र ब्रह्मकुंड और सप्तधाराओं में निवास करते हैं। इस समय अन्य सभी तीर्थ ‘मल’ (अशुद्ध) माने जाते हैं और केवल राजगीर ही पूर्णतः जागृत तीर्थस्थल होता है। राजा वसु की न्यायप्रियता से प्रसन्न होकर श्रीहरि विष्णु ने इस क्षेत्र को यह विशेष वरदान दिया था।
  • मदसरवा (अरवल) और राजा शर्याति का वैदिक वैभव:
    मगध की विरासत केवल राजगीर तक सीमित नहीं है। अरवल जिले के कलेर प्रखंड में सोन (वैदिक नदी) के तट पर स्थित ‘मदसरवा’ का इतिहास अत्यंत प्राचीन है, जिसे पूर्व में हिरण्य प्रदेश’ कहा जाता था। यहाँ न्यायप्रिय राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या और परम तपस्वी च्यवन ऋषि की अमर कथा जुड़ी है। इसी पावन भूमि पर मधुश्रवा ऋषि, च्यवन ऋषि और सुकन्या के सानिध्य में ऐतिहासिक ‘ब्रह्मेष्ठि यज्ञ’ सम्पन्न हुआ था, जिसमें सृष्टि की ऊर्जा के स्रोत १२ आदित्य, ११ रुद्र, ८ वसु और देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार उपस्थित हुए थे। इसी क्षेत्र में अश्विनी कुमारों ने च्यवन ऋषि को पुनः युवावस्था प्रदान की थी।

आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने श्रद्धालुओं के कल्याणार्थ इस मास के कुछ विशेष नियम और उपाय सुझाए हैं:
साधना और दान का महत्व: ०२ मई से शुरू होकर २९ जून तक चलने वाले इस ‘महा-ज्येष्ठ’ की भीषण गर्मी में जल और छाया का दान ही सबसे बड़ा धर्म है। इस माह के देवता वरुण (जल देव) और सूर्य हैं, इसलिए राहगीरों के लिए प्याऊ लगवाना और पशु-पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था करना अनंत फलदायी है।”

विष्णु साधना: इस दौरान भगवान विष्णु के ‘त्रिविक्रम’ स्वरूप की पूजा की जानी चाहिए। विष्णु सहस्रनाम का पाठ और सात्विक दिनचर्या इस कठिन तपिश में मानसिक शांति प्रदान करती है।
वर्जित कार्य: मलमास (१७ मई से १५ जून) के दौरान विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे, क्योंकि यह समय केवल आत्म-चिंतन, जप और आध्यात्मिक साधना के लिए आरक्षित है।

पीठाधीश्वर महाराज श्री ने आह्वान किया कि राजगीर का मलमास मेला हो या मदसरवा की वैदिक स्मृतियाँ, ये हमारे पूर्वजों की समृद्ध संस्कृति का जीवंत प्रमाण हैं। मगध केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि एक सशक्त विचार है। वर्ष २०२६ का यह पुरुषोत्तम मास हमें अपनी इन लुप्त होती धरोहरों को फिर से सहेजने और भगवान विष्णु की शरण में जाने का एक दिव्य अवसर प्रदान कर रहा है। हमें इस सुनहरे अवसर का भरसक सदुपयोग करते हुए आत्मोन्नति के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए।

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