
ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर मनाया जाने वाला शनि जयंती इस वर्ष 16 मई को मनाया जाएगा। खास बात यह है कि इस बार यह पर्व शनिवार के दिन पड़ रहा है, जिससे कई दुर्लभ और शुभ योग बन रहे हैं। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार करीब 10 वर्षों बाद ऐसा विशेष संयोग बना है, जब शनि जयंती शनिवार को पड़ रही है। इस कारण इसे ‘शनैश्चरी अमावस्या’ भी कहा जा रहा है।
पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 16 मई को सुबह 5:11 बजे प्रारंभ होकर 17 मई की रात 1:30 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर पर्व 16 मई को ही मनाया जाएगा। बीते 20 वर्षों में यह चौथा अवसर होगा जब न्याय के देवता शनिदेव की जयंती उनके प्रिय दिन शनिवार को मनाई जाएगी। इससे पहले यह संयोग 27 मई 2006, 8 जून 2013 और 4 जून 2016 को बना था।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस बार का शनि जन्मोत्सव कई राशियों के लिए शुभ संकेत लेकर आ रहा है। आचार्य दिनेश महाराज के अनुसार वर्ष 2026 में शनिदेव मीन राशि में विराजमान हैं, जिससे सिंह, धनु, कुंभ और मीन राशि के जातकों को विशेष लाभ मिलने के योग बन रहे हैं। इन राशियों के लोगों को करियर में उन्नति और धन लाभ के संकेत मिल सकते हैं। वहीं कुंभ, मीन और मेष राशि वालों को विशेष रूप से शनिदेव की पूजा करने की सलाह दी गई है। धनु और सिंह राशि पर ढैय्या का मिश्रित प्रभाव रहेगा।
ज्योतिषाचार्यों ने राशि अनुसार पूजा-अनुष्ठान करने की भी सलाह दी है। मेष और वृश्चिक राशि के जातकों को हनुमान चालीसा का पाठ करना शुभ माना गया है। वृषभ और तुला राशि वालों को शनि चालीसा पढ़ने, जबकि मिथुन और कन्या राशि वालों को ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ मंत्र का 108 बार जाप करने की सलाह दी गई है। कर्क और सिंह राशि के लोग पीपल वृक्ष के नीचे सरसों तेल का दीपक जलाएं, जबकि धनु और मीन राशि के जातक शनिदेव का सरसों तेल से अभिषेक करें। मकर और कुंभ राशि वालों को दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करना लाभकारी बताया गया है।
शहर के विभिन्न शनि एवं हनुमान मंदिरों में शनि जयंती पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। राजकिशोर नगर स्थित शनि मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और दिनभर भंडारे का आयोजन होगा। वहीं चिल्हाटी शनि मंदिर में रात 1 बजे से विशेष पूजन प्रारंभ होगा और 1001 लीटर तेल से भगवान शनिदेव का अभिषेक किया जाएगा।
ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस दिन चंद्रमा वृषभ राशि में प्रवेश करेंगे और रोहिणी नक्षत्र के साथ विशेष संयोग बनाएंगे। इसे ज्योतिष में ‘दोहरा गोचर’ माना जाता है। वहीं शनि जन्मोत्सव के अगले दिन शनिदेव अपने जन्म नक्षत्र रेवती में प्रवेश करेंगे, जिससे इस पर्व का महत्व और अधिक बढ़ गया है।
