किचन में महंगाई की मार: पैकेट छोटे, दाम बड़े—तेल कंपनियों की ‘श्रिंकफ्लेशन’ रणनीति


बिलासपुर। रसोई के बजट पर एक और मार पड़ी है। खाने के तेल में कंपनियों ने पहले पैकेट का वजन घटाया और अब कीमतें भी बढ़ा दी हैं। सोयाबीन, सनफ्लावर, सरसों और पाम तेल के कई ब्रांड्स में प्रति किलो 12.50 से 13 रुपए तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे आम उपभोक्ता पर सीधा असर पड़ रहा है।


बाजार में पहले 910 ग्राम में मिलने वाला तेल अब घटकर 750–800 ग्राम के पैकेट में बेचा जा रहा है। उदाहरण के तौर पर किंग्स ब्रांड का पैकेट 750 ग्राम कर दिया गया है, जिसकी कीमत करीब 130 रुपए है। वहीं, फॉरचून के 800 ग्राम पैकेट की कीमत बढ़कर 195 रुपए पहुंच गई है। 5 लीटर के जेरीकेन में भी अब करीब 4.350 किलो तेल ही मिल रहा है, जिसकी एमआरपी 236 रुपए तक पहुंच गई है।


व्यापार विहार मंडी, जो संभाग की सबसे बड़ी थोक मंडी मानी जाती है, वहां रोजाना लगभग 1.20 लाख लीटर तेल की आवक होती है। यहां से 25 से अधिक डीलर तेल को बिलासपुर सहित गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, मुंगेली, कोरबा और जांजगीर-चांपा जैसे जिलों में सप्लाई करते हैं। व्यापारियों का कहना है कि पैकेट का वजन घटाना और कीमत तय करना पूरी तरह कंपनियों का निर्णय है।


ग्राहकों की शिकायत है कि उन्हें पैकेट के वजन में कटौती की जानकारी ही नहीं थी। अब कीमत बढ़ने के बाद उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। कई उपभोक्ताओं ने बताया कि हाल के महीनों में तेल के पैकेट पर करीब 10 रुपए तक की बढ़ोतरी हुई है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, पैकेट का वजन घटाकर कीमत बढ़ाने की इस प्रक्रिया को ‘Shrinkflation’ कहा जाता है। इसमें कंपनियां कीमत सीधे बढ़ाने के बजाय पैक साइज कम कर देती हैं, जिससे उपभोक्ताओं को तुरंत बढ़ोतरी का अहसास नहीं होता और कंपनियां अपना मुनाफा बनाए रखती हैं।
जानकारों के मुताबिक राज्य में खाने के तेल की सालाना खपत 55 से 65 लाख टन के बीच आंकी जा रही है, जो पिछले वर्षों के मुकाबले काफी बढ़ी है। वहीं नाप-तौल विभाग के अनुसार, पहले पैकेट के वजन पर सख्त नियंत्रण था, लेकिन अब यूनिट सेल प्राइस लागू होने के बाद यह नियंत्रण काफी हद तक कम हो गया है।
कुल मिलाकर, पैकेट छोटा होने और कीमत बढ़ने से आम लोगों की रसोई का बजट बिगड़ता जा रहा है, जबकि अधिकांश उपभोक्ता इस बदलाव को देर से समझ पा रहे हैं।

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