विश्व रंगमंच दिवस पर बिलासपुर में सजी ‘थिएट्रिकल ईवनिंग’, आनंद संघ के आयोजन में बंगाली नाट्य कला की जीवंत प्रस्तुति ने बांधा समां

प्रवीर भट्टाचार्य


बिलासपुर। रंगमंच की सजीव परंपरा, भावनाओं की गहराई और अभिनय की ऊंचाइयों से सराबोर एक यादगार सांस्कृतिक संध्या का आयोजन इस रविवार शहर में किया गया। विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर स्थानीय प्रवासी बंगाली समाज की सक्रिय सांस्कृतिक संस्था आनंद संघ द्वारा आयोजित “थिएट्रिकल ईवनिंग” ने कला प्रेमियों के हृदय को छू लिया। एसईसीएल बसंत विहार स्थित रवींद्र सदन का सभागार दर्शकों की उत्साही उपस्थिति से खचाखच भरा रहा, जो इस आयोजन के प्रति लोगों के गहरे जुड़ाव और उत्साह का प्रतीक था।


इस आयोजन का मूल उद्देश्य रंगमंच की महत्ता को रेखांकित करते हुए कला और संस्कृति के प्रति समाज में जागरूकता का संचार करना था। बिलासपुर में निवासरत बंगाली समुदाय की वर्तमान पीढ़ी अपने पूर्वजों द्वारा संरक्षित समृद्ध नाट्य परंपरा को अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित करने के संकल्प के साथ इस सांस्कृतिक पहल को साकार कर रही है। इसी भावना के अनुरूप कोलकाता से आमंत्रित प्रतिष्ठित “सोबार पथ” थिएटर ग्रुप के कलाकारों ने अपनी सशक्त प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।


कार्यक्रम में दो प्रभावशाली बंगाली नाटकों—“शीतल पाटी” और “दरकारी सरकार”—का मंचन किया गया। “शीतल पाटी” एक गहन संवेदनात्मक मोनोलॉग नाटक था, जिसमें कलाकार संजीता ने अपनी अद्भुत अभिनय क्षमता के माध्यम से एक बेसहारा, संघर्षशील एकल माँ की पीड़ा, उसकी आत्मस्वीकृति और जीवन के प्रति उसकी जिजीविषा को अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया। मंच पर एकमात्र पात्र होते हुए भी संजीता ने अपनी भाव-भंगिमाओं और संवाद अदायगी से उन अनदेखे पात्रों को भी सजीव कर दिया, जो कहानी के ताने-बाने में गहराई से जुड़े थे। दर्शक उनकी प्रस्तुति के साथ भावनात्मक रूप से इस कदर जुड़ गए कि सभागार में एक अद्भुत सन्नाटा और संवेदना की लहर व्याप्त हो गई।


दूसरी प्रस्तुति “दरकारी सरकार” ने दर्शकों को स्वतंत्रता संग्राम के दौर, विशेषकर 1942 के कालखंड में ले जाकर खड़ा कर दिया। इस नाटक में आजादी की जद्दोजहद, सामाजिक संघर्ष और मानवीय रिश्तों के बीच के द्वंद्व को बेहद सहज और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। कलाकारों—पियाली, कौशिक, आड़ी, झील और संजीता—ने अपने सशक्त अभिनय से उस ऐतिहासिक कालखंड की भावनाओं को जीवंत कर दिया। नाटक का निर्देशन संजीता द्वारा किया गया, जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा का परिचायक रहा।


मंच संयोजन, प्रकाश और ध्वनि व्यवस्था ने प्रस्तुतियों की प्रभावशीलता को और भी सुदृढ़ किया, जिससे प्रत्येक दृश्य दर्शकों के मन-मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ता गया। कार्यक्रम के समापन पर सभी कलाकारों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया, जिससे उनकी कला साधना के प्रति सम्मान और सराहना व्यक्त की गई।


इस आयोजन की सफलता के पीछे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉ. हेमंत चटर्जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होते, बल्कि समाज को उसकी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने का सशक्त माध्यम भी होते हैं। उन्होंने भविष्य में भी इस तरह के आयोजनों को निरंतर जारी रखने की आवश्यकता पर बल दिया।


आनंद संघ की सपना जाना ने बताया कि उनकी संस्था केवल सांस्कृतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य शिविर, पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण तथा महिला एवं बालिका शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक विषयों पर भी सक्रिय रूप से कार्य कर रही है। वहीं संस्था की जयश्री सरकार ने वर्तमान पीढ़ी की बदलती रुचियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज का युवा वर्ग 30 सेकंड की रील्स तक सीमित होता जा रहा है, जिससे वह अपनी समृद्ध नाट्य परंपरा से दूर होता जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि रंगमंच ही अभिनय की जननी है और इसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।


इस सांस्कृतिक संध्या में बिलासपुर के बंगाली समाज के साथ-साथ कला प्रेमियों की बड़ी संख्या में उपस्थिति ने यह सिद्ध कर दिया कि रंगमंच की जड़ें आज भी समाज में गहराई तक समाई हुई हैं। आनंद संघ और शहर के प्रबुद्ध नागरिकों के सहयोग से आयोजित यह कार्यक्रम न केवल सफल रहा, बल्कि सांस्कृतिक चेतना को नई ऊर्जा प्रदान करने वाला भी सिद्ध हुआ।

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