
शशि मिश्रा

बिलासपुर। गर्मी के मौसम में ठंडे पेय पदार्थों की बढ़ती मांग के बीच शहर में एक गंभीर लापरवाही सामने आई है। तोरवा पावर हाउस के पास स्थित एक आइस फैक्ट्री, जहां साफ तौर पर लिखा है कि यहां बनने वाली बर्फ “खाने योग्य नहीं है”, वही बर्फ शहर ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों तक धड़ल्ले से सप्लाई की जा रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह फैक्ट्री बिना वैध लाइसेंस के संचालित हो रही है।
जानकारी के मुताबिक, मछली बाजार परिसर में स्थित शकुंतला आइस फैक्ट्री मछली विभाग की जमीन और सरकारी मशीनों पर संचालित है। इसे चांटीडीह के एक मछली विक्रेता को लीज पर दिया गया है। फैक्ट्री के बाहर स्पष्ट चेतावनी लिखी होने के बावजूद यहां उत्पादित बर्फ का उपयोग जूस सेंटर, गन्ना रस की दुकानों और अन्य ठेले-खोमचों में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।

रोजाना 10 हजार किलो बर्फ की खपत
फैक्ट्री के कर्मचारियों के अनुसार, प्रतिदिन करीब 10 हजार किलो बर्फ शहर में खप रही है। एक बर्फ की सिल्ली लगभग 140 किलो की होती है, जिसकी कीमत करीब 800 रुपए है। इतनी बड़ी मात्रा में सप्लाई के बावजूद इसकी गुणवत्ता और उपयोग पर कोई ठोस निगरानी नहीं है।
खाने वाली बर्फ के मानक हो रहे नजरअंदाज
विशेषज्ञों के अनुसार, खाने योग्य बर्फ पूरी तरह पारदर्शी (पानी के रंग जैसी) होनी चाहिए, जबकि व्यावसायिक उपयोग के लिए बनने वाली बर्फ में नीला रंग होना अनिवार्य है, ताकि अंतर स्पष्ट हो सके। लेकिन शहर की फैक्ट्रियों में इस नियम का पालन नहीं किया जा रहा है, जिससे आम उपभोक्ता भ्रमित हो रहे हैं।
मांस-मछली और शव संरक्षण वाली बर्फ का उपयोग
स्थिति और चिंताजनक तब हो जाती है जब यह सामने आता है कि यही बर्फ मांस, मछली और यहां तक कि शव संरक्षण में उपयोग के लिए बनाई जाती है। स्वच्छता के मानकों की अनदेखी करते हुए इसी बर्फ को सीधे पेय पदार्थों में इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
बोर के पानी से निर्माण, स्वच्छता पर सवाल
फैक्ट्री में बर्फ बनाने के लिए बोरवेल के पानी का उपयोग किया जा रहा है। इस पानी की गुणवत्ता और शुद्धता की जांच को लेकर कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। स्वास्थ्य एवं खाद्य विभाग की ओर से भी अब तक कोई सख्त कार्रवाई या जांच नहीं की गई है।
बढ़ सकता है बीमारियों का खतरा
हर साल गर्मियों में पीलिया, डायरिया और पेट संबंधी बीमारियों के मामले बढ़ते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दूषित बर्फ इसका एक बड़ा कारण है। ठेले वाले भी बर्फ को गंदी बोरियों या लकड़ी की पेटियों में रखते हैं और सीधे पेय पदार्थों में डाल देते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
इतनी गंभीर स्थिति के बावजूद जिला प्रशासन और खाद्य एवं औषधि विभाग की निष्क्रियता सवालों के घेरे में है। बिना लाइसेंस संचालित फैक्ट्री और खुलेआम हो रही सप्लाई के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
बिलासपुर में “नॉन-एडिबल” बर्फ का यह कारोबार न सिर्फ नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है, बल्कि आम लोगों की सेहत के साथ भी खिलवाड़ कर रहा है। समय रहते यदि प्रशासन ने सख्त कदम नहीं उठाए, तो यह लापरवाही एक बड़े स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकती है।
