

रायपुर। छत्तीसगढ़ में अवैध धर्मांतरण पर सख्ती लाने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा लाया गया ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक’ गुरुवार को विधानसभा में चर्चा के बाद पारित हो गया। यह नया कानून वर्ष 1968 में बने 58 साल पुराने कानून की जगह लेगा। सरकार का कहना है कि यह विधेयक राज्य की सांस्कृतिक पहचान, आस्था और परंपराओं की रक्षा के लिए एक “सुरक्षा कवच” साबित होगा।
इस कानून के तहत अवैध धर्मांतरण, सामूहिक धर्मांतरण, विवाह के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन और विदेशी फंडिंग के जरिए धर्मांतरण पर कड़ी रोक लगाने का प्रावधान किया गया है। खास बात यह है कि अब डिजिटल माध्यमों से होने वाले धर्मांतरण भी कानून के दायरे में आएंगे।
कड़े दंड का प्रावधान
नए कानून में अपराध की प्रकृति के आधार पर सजा को तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है—
1. सामान्य अवैध धर्मांतरण:
7 से 10 वर्ष तक की सजा
5 लाख रुपये तक का जुर्माना
यदि पीड़ित नाबालिग, महिला, मानसिक रूप से अस्वस्थ या एससी/एसटी वर्ग से है, तो
10 से 20 वर्ष तक की सजा
न्यूनतम 10 लाख रुपये जुर्माना
2. सामूहिक धर्मांतरण:
एक साथ दो या अधिक लोगों का धर्मांतरण कराने पर
आजीवन कारावास
न्यूनतम 25 लाख रुपये का जुर्माना
दोबारा दोषी पाए जाने पर भी सीधे उम्रकैद
3. अन्य प्रावधान:
पीड़ित को 10 लाख रुपये तक मुआवजा दिलाने का प्रावधान
सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानतीय होंगे
विवाह और विदेशी फंडिंग पर सख्ती
विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि केवल विवाह के उद्देश्य से किया गया धर्मांतरण अवैध माना जाएगा। विवाह से पहले या बाद में धर्म परिवर्तन करने के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य होगा।
इसके अलावा धर्मांतरण के लिए किसी भी विदेशी संस्था या स्रोत से आर्थिक लाभ लेने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।
धर्मांतरण की प्रक्रिया होगी कठिन
अब धर्म परिवर्तन केवल व्यक्तिगत इच्छा का विषय नहीं रहेगा, बल्कि एक कानूनी प्रक्रिया के तहत होगा—
इच्छुक व्यक्ति और धर्मांतरण कराने वाला व्यक्ति 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट या एडीएम को आवेदन देंगे
इस सूचना को सार्वजनिक किया जाएगा
30 दिन के भीतर कोई भी नागरिक आपत्ति दर्ज कर सकेगा
‘घर वापसी’ को मिली छूट
विधेयक में यह महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़ा गया है कि यदि कोई व्यक्ति अपने पैतृक धर्म में वापस लौटता है, तो उसे धर्मांतरण नहीं माना जाएगा। ऐसे मामलों में यह कानून लागू नहीं होगा।
सरकार का पक्ष
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि लंबे समय से अशिक्षा, गरीबी और अज्ञानता का फायदा उठाकर प्रलोभन, दबाव और भय के जरिए धर्मांतरण की घटनाएं सामने आ रही थीं। नया कानून ऐसी “अवैध और अनैतिक गतिविधियों” पर प्रभावी रोक लगाएगा।
गृहमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि 1968 का कानून कमजोर था और वर्तमान परिस्थितियों में धर्मांतरण ने सामाजिक तनाव की स्थिति पैदा कर दी है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि इस मुद्दे पर चर्चा से बचने के लिए कांग्रेस ने वॉकआउट किया।
विपक्ष का बहिष्कार
उम्मीद के अनुरूप इस विधेयक पर चर्चा शुरू होने से पहले ही कांग्रेस ने सदन से बहिष्कार कर दिया। सरकार की ओर से आरोप लगाया गया कि कांग्रेस इस मुद्दे पर चर्चा से इसलिए बच रही है क्योंकि इससे उसका वोट बैंक प्रभावित हो सकता है। वैसे यह कानून अवैध धर्मांतरण के खिलाफ है , जिसमें हिंदू भी सम्मिलित है लेकिन शायद कांग्रेस को पता है कि अवैध धर्मांतरण कौन करता है और वही उनका वोट बैंक है। इसलिए कांग्रेस उनके साथ खड़ी नजर आ रही है
विवाद और पृष्ठभूमि
पिछले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ धर्मांतरण विवादों का केंद्र बनता रहा है।
बस्तर में धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासियों के अंतिम संस्कार को लेकर विवाद
रायपुर में ननों की गिरफ्तारी का मामला, जिन पर आदिवासी लड़कियों को बहला-फुसलाकर ले जाने का आरोप लगा
कांकेर में ग्राम सभाओं द्वारा बाहरी पादरियों के प्रवेश पर रोक
रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में देशभर में मसीही समुदाय से जुड़े विवादों में लगभग 40 मामले अकेले छत्तीसगढ़ में दर्ज हुए। वहीं 2025 में नवंबर तक 19 बड़ी घटनाएं सामने आईं।
सामाजिक प्रतिक्रिया
बिलासपुर में अवैध धर्मांतरण के खिलाफ सक्रिय रहे ठाकुर राम सिंह ने विधेयक का स्वागत करते हुए कहा कि अब इस तरह की गतिविधियों के खिलाफ और अधिक मजबूती से कार्रवाई की जाएगी।
छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक के पारित होने के साथ ही राज्य में धर्मांतरण से जुड़े मामलों पर कड़ी निगरानी और सख्त दंड का रास्ता साफ हो गया है। सरकार इसे सांस्कृतिक सुरक्षा का कदम बता रही है, जबकि विपक्ष के बहिष्कार ने इस कानून को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
